भारतीय संविधान: संविधान में प्रस्तावना माता-पिता की तरह स्थाई, कोई नहीं बदल सकता; धनखड़
Kerala News: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कोच्चि में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज में भारतीय संविधान की प्रस्तावना को माता-पिता की तरह अटल बताया। उन्होंने कहा कि इसे बदलना असंभव है। इमरजेंसी के दौरान इसमें हुए बदलाव पर दुख जताते हुए उन्होंने इसे लोकतंत्र का काला दौर करार दिया। यह बयान आरएसएस की ओर से प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की समीक्षा की मांग के बीच आया है।
प्रस्तावना को माता-पिता से जोड़ा
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना की तुलना माता-पिता से की। उन्होंने कहा कि जैसे माता-पिता को बदला नहीं जा सकता, वैसे ही प्रस्तावना को बदलना संभव नहीं है। कोच्चि में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने जोर दिया कि किसी भी देश की प्रस्तावना को बदलने का इतिहास नहीं है। लेकिन भारत में इमरजेंसी के दौरान इसमें बदलाव हुआ, जो दुखद है।
इमरजेंसी के दौरान बदली गई प्रस्तावना
1975 से 1977 तक इमरजेंसी के दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संविधान के 42वें संशोधन के जरिए प्रस्तावना में बदलाव किया। इसमें ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए। धनखड़ ने इसे लोकतंत्र का सबसे काला दौर बताया, जब हजारों लोग जेल में थे। उन्होंने कहा कि उस समय प्रेस पर सेंसरशिप थी और नागरिक अधिकार निलंबित थे। यह बदलाव संविधान के मूल स्वरूप को प्रभावित करने वाला था।
आरएसएस ने उठाया शब्दों पर सवाल
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने हाल ही में इमरजेंसी के 50 साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम में प्रस्तावना में जोड़े गए शब्दों पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि बाबासाहेब अम्बेडकर ने मूल प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों का उपयोग नहीं किया था। ये शब्द इमरजेंसी के दौरान जोड़े गए, जब मौलिक अधिकार निलंबित थे और न्यायपालिका कमजोर थी।
प्रस्तावना का महत्व समझाया
उपराष्ट्रपति ने कहा कि किसी भी संविधान की प्रस्तावना उसका सार है। यह संविधान के उद्देश्यों और मूल्यों को दर्शाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को ‘संप्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य’ घोषित किया गया है। धनखड़ ने इसे संविधान की आत्मा बताया और कहा कि इसका मूल स्वरूप बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने छात्रों से संविधान के मूल्यों को समझने का आह्वान किया।
इमरजेंसी का काला दौर
धनखड़ ने इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र का सबसे मुश्किल समय बताया। इस दौरान सरकार ने हजारों लोगों को गिरफ्तार किया था। प्रेस की आजादी छीन ली गई थी। कई बड़े नेता और पत्रकार जेल में थे। नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। उपराष्ट्रपति ने कहा कि उस समय प्रस्तावना में बदलाव करना संविधान के मूल भाव के साथ खिलवाड़ था, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।
संविधान की प्रस्तावना पर बहस
उपराष्ट्रपति के बयान ने संविधान की प्रस्तावना पर नई बहस छेड़ दी है। आरएसएस की ओर से शब्दों की समीक्षा की मांग ने इस मुद्दे को और गर्म कर दिया है। धनखड़ ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावना को बदलना असंभव है, लेकिन इमरजेंसी के दौरान हुए बदलाव ने संविधान के मूल स्वरूप पर सवाल उठाए। उन्होंने युवाओं से संविधान के प्रति जागरूक रहने को कहा।
कोच्चि में छात्रों से संवाद
कोच्चि, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज में धनखड़ ने छात्रों और शिक्षकों से संवाद किया। उन्होंने संविधान के महत्व पर जोर दिया और कहा कि प्रस्तावना देश के मूल्यों का प्रतीक है। उनके बयान ने संविधान के प्रति सम्मान और जागरूकता बढ़ाने का संदेश दिया। उपराष्ट्रपति ने युवाओं से अपील की कि वे संविधान के सिद्धांतों को समझें और लोकतंत्र को मजबूत करें।
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