ज़िन्दगी भेस बदल कर जहाँ फ़न बनती है
मीर-ओ-ग़ालिब का वो अंदाज-ए-बयाँ है उर्दू
Talaash- तलाश
दर्द के सियाह में, कुछ ख्वाहिशों की लाश है।
ग़म मिटाने के लिए, एक चाँद की तलाश है।
वो चेहरे बैठे ढांक के, था जिनसे मेरा वासता।
हो सच में एक सहारा जो, उस शख्स की तलाश है।
वो जिसका होने से मुझे, होने का गुमान हो।
वो हमसफर वो अहल-ए-दिल, उस साथ की तलाश है।
मैं जानता नहीं मुझे, मैं खुद हूँ खुद से अजनबी।
वजूद में खुदी के अब, खुद की भी तलाश है।
क्यों मन्द है ये धड़कने, क्यों द्वंद सा मचा हुआ।
दे दिल को जो तसल्ली, उस सुकून की तालाश है।
उलझे से ये धागे कुछ, हथेलियों को जकड़े हैं।
गिरह जो सारी खोल दे, उस हाथ की तलाश है।
सांझ की ये चीख है, या दिल की है सिसकियाँ।
दबा दे हर आवाज़ को, उस शोर की तलाश है।
न मिल सका मुझे कभी, मैं ढूंढता सा थक गया।
था जिसकी मैं तलाश में, उस तलाश की तलाश है।
मुसाफिर
Dard ke siyaah mein,Poetry ASHAAR You may also Like-
#besthindikavita #besturdupoetry #chaand #dardbharishayari #hindi #Kavita #kavitakosh #kavya #poetry #poetrylovers #rekhta #sadpoetry #Shayari #talaash #Urdupoetry"कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ"
~ अहमद फ़राज़
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"किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ"
~ अहमद फ़राज़
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"रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ"
~ अहमद फ़राज़
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"ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें कि जो
रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएँगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रोशनी हैं नवा हैं हवा हैं
जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं
ज़ुल्म के दोज़खों से भी फुकते नहीं
रोशनी और नवा के अलम
मक़्तलों में पहुँचकर भी झुकते नहीं
ख़्वाब तो हर्फ़ हैं
ख़्वाब तो नूर हैं
ख़्वाब सुक़रात हैं
ख़्वाब मंसूर हैं"
~ अहमद फ़राज़
"अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह
आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ"
~ अहमद फ़राज़
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जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो
फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सरे-मिम्बर है
किसके है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो
ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने
क्यों पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो
इन चिराग़ों के तले ऐसे अंधेरे क्यों हैं
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो
~ जावेद अख़्तर