ज़िन्दगी भेस बदल कर जहाँ फ़न बनती है
मीर-ओ-ग़ालिब का वो अंदाज-ए-बयाँ है उर्दू
"कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ"
~ अहमद फ़राज़
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"किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ"
~ अहमद फ़राज़
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"रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ"
~ अहमद फ़राज़
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"ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब दिल हैं न आँखें न साँसें कि जो
रेज़ा-रेज़ा हुए तो बिखर जाएँगे
जिस्म की मौत से ये भी मर जाएँगे
ख़्वाब मरते नहीं
ख़्वाब तो रोशनी हैं नवा हैं हवा हैं
जो काले पहाड़ों से रुकते नहीं
ज़ुल्म के दोज़खों से भी फुकते नहीं
रोशनी और नवा के अलम
मक़्तलों में पहुँचकर भी झुकते नहीं
ख़्वाब तो हर्फ़ हैं
ख़्वाब तो नूर हैं
ख़्वाब सुक़रात हैं
ख़्वाब मंसूर हैं"
~ अहमद फ़राज़
"अब ज़मीं पर कोई गौतम न मोहम्मद न मसीह
आसमानों से नए लोग उतारे जाएँ"
~ अहमद फ़राज़
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जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो
फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सरे-मिम्बर है
किसके है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो
ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुमने
क्यों पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो
इन चिराग़ों के तले ऐसे अंधेरे क्यों हैं
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो
तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो
ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो
~ जावेद अख़्तर
Here is Hazaron Khwahishen Aisi in the voice of Jagjit Singh from the Tele Series Mirza Ghalib starring Nasiruddin Shah.
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हुई जिन से तवक़्क़ो' ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइ'ज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
~ ग़ालिब
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