Latest Hindi News : सुप्रीम कोर्ट का वक्फ संशोधन अधिनियम पर फैसला, दोनों पक्ष संतुष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने इंकार कर दिया। हालांकि, वक्फ कानून के कुछ प्रावधानों पर कोर्ट ने आंशिक संशोधन और एक प्रावधान पर पूर्ण रोक लगा दी है।

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Aadhaar: आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, सुप्रीम कोर्ट

Aadhaar: प्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आधार को नागरिकता का एकमात्र प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने सोमवार को राजनीतिक दलों की

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⚠️ Vụ việc nghiêm trọng: Tài xế taxi XanhSM bị cáo buộc đá chết khách hàng vì không đòi được tiền cước. Vụ án xảy ra ngay trước cổng công an phường.

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Không đòi được tiền, tài xế taxi đá vào mặt khiến khách hàng ngã ngửa tử vong

Bực tức vì khách hàng không chịu trả tiền sau khi đặt xe, một tài xế taxi công nghệ đã đá chết khách ngay trước cổng công an phường.

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Court Records Reveal Sig Sauer Knew of Pistol Risks for Years

According to a court exhibit, Sig Sauer identified several deadly risks with its P320 pistols as early as 2017.

The Smoking Gun

दो यूथ कांग्रेस के लोगों की हत्या के केस में आया बड़ा फैसला, सीपीएम के पूर्व विधायक समेत 14 दोषी करार

Kerala News: केरल में शनिवार को सीबीआई की अदालत ने 2019 में केरल के कासरगोड जिले के पेरिया शहर में यूथ कांग्रेस के दो लोगों की हत्या के केस में सीपीएम के एक पूर्व विधायक को दोषी ठहराया है। अदालत ने 19 साल के कृपेश और 23 साल के सारथ लाल की हत्या के मामले में 14 लोगों को दोषी ठहराया है। दोषियों में पूर्व सीपीएम विधायक केवी कुनिरामन का नाम भी शामिल है। इस केस में कुल 24 आरोपी थे। उनमें से 10 को अदालत ने बरी कर दिया। अदालत 3 जनवरी को सजा सुनाएगी। कोर्ट ने ने कुनिरामन और तीन अन्य को सजा सुनाए जाने तक जमानत दे दी है।

दोषियों में प्रमुख सीपीएम कार्यकर्ताओं में कुनिरामन, कन्हांगद ब्लॉक पंचायत अध्यक्ष के मणिकंदन, पूर्व पेरिया स्थानीय समिति सदस्य ए पीथंबरण और पूर्व पक्कम सचिव रघवन वेलुथोली शामिल हैं। अन्य दोषी ठहराए गए लोगों में साजी सी जॉर्ज, सुरेश केएम, अनिल कुमार के उर्फ अबू, गिजिन, श्रीराग आर उर्फ कुट्टू, अश्विन ए उर्फ अप्पू, सुबीश उर्फ मणि, रंजनथ टी उर्फ अप्पू, ए सुरेन्द्रन उर्फ विष्णु सुरा और केवी भास्करन का नाम शामिल है।

कृपेश और सारथ लाल को 17 फरवरी 2019 को प्रतिशोध की भावना से की गई एक हमले में धारदार हथियारों से मारा गया था। यूथ कांग्रेस के सदस्यों को घर लौटते समय आठ लोगों के एक समूह द्वारा घेरकर हमला कर मार दिया गया था।

केरल में विपक्षी कांग्रेस और भाजपा ने 10 आरोपियों के बरी होने के खिलाफ अपील करने की मांग की है। सारथ लाल के पिता सत्यनारायणन ने मिश्रित भावनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा, “यह फैसला एक राहत है, लेकिन हम खुश नहीं हो सकते क्योंकि हमारे बेटों की हत्या सीपीएम के नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा की गई थी।” उन्होंने यह भी कहा कि परिवार 10 आरोपियों के बरी होने के खिलाफ सीबीआई से अपील करेगा।

कृपेश के पिता कृष्णन पीवी ने सीपीएम की हिंसा की राजनीति की आलोचना करते हुए इस फैसले को पार्टी के लिए नैतिक हार बताया। अदालत ने कुनिरामन, मणिकंदन, रघवन और भास्करन को आईपीसी धारा 225 के तहत दोषी ठहराया। वहीं, हत्या में सीधे तौर पर शामिल आठ अन्य आरोपियों को आईपीसी की धारा 302, 201, 148, 341 और 120(b) के तहत दोषी ठहराया।

कांग्रेस के वीडी सतीशान ने सीपीएम पर आरोपियों का बचाव करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “सरकार को अपराधियों पर मुकदमा चलाना चाहिए था, लेकिन उसने सार्वजनिक करों से 1 करोड़ रुपये खर्च किए ताकि सीबीआई हस्तक्षेप न कर सके। सीपीएम ने इस हत्या की साजिश रची।” उन्होंने मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से माफी मांगने की मांग की है।

केरल भाजपा अध्यक्ष के सुरेन्द्रन ने सीबीआई को सीपीएम नेताओं की संलिप्तता उजागर करने के लिए श्रेय दिया। उन्होंने कहा, “राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा जांच किए गए ऐसे मामलों में अक्सर सीपीएम के कार्यकर्ता बच जाते हैं।”

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परिजनों या दोस्तों का बेटी के घर में ज्यादा समय रहना भी क्रूरता, अदालत ने मंजूर किया तलाक; जानें पूरा मामला

Kolkata News: बेटी की ससुराल में उसके घरवालों और दोस्तों का लंबे समय तक टिक जाना भी क्रूरता है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसी आधार पर 19 दिसंबर को एक व्यक्ति को तलाक की मंजूरी दे दी। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहाकि पति की मर्जी के खिलाफ पत्नी के दोस्तों या रिश्तेदारों का लंबे समय तक उसके घर में रहना क्रूरता है। कई बार ऐसे हालात में जबकि पत्नी खुद भी घर में नहीं है, रिश्तेदारों की वहां मौजूदगी से अपीलकर्ता की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा होगा। महिला के पति ने साल 2008 में शादी के तीन साल बाद ही तलाक की अर्जी फाइल की थी।

इन दोनों की शादी पश्चिम बंगाल के नाबाद्वीप में हुई थी। बाद में साल 2006 में यह दोनों कोलाघाट चले आए, जहां पति काम करता था। साल 2008 में पत्नी कोलकाता के नारकेलडांगा चली गई। उसका कहना था कि यहां पर रहना उसके लिए ज्यादा सुविधाजनक था, क्योंकि यह सियालदह से नजदीक पड़ता है, जहां वह काम करती है। हालांकि पूछताछ के दौरान उसने दावा किया कि वह अपने पति से दूर इसलिए हुई क्योंकि वह असहाय हो गई थी।

साल 2008 में कोलाघाट स्थित पति के घर से पत्नी के चले जाने के बाद भी उसका परिवार और एक दोस्त वहीं ठहरे रहे। साल 2016 में पत्नी उत्तरपारा चली गई। पति का कहना है कि पत्नी का उससे दूर रहता क्रूरता है। इसके अलावा उसने यह भी कहाकि पत्नी किसी तरह का संबंध रखने या फिर बच्चे पैदा करने की इच्छुक नहीं है।

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दूसरे मर्द के साथ रह रही महिला 494/495 के तहत अपराधी, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव इन रिलेशन को लेकर दिया फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने मंगलवार को लिव-इन-रिलेशन (Live in Relationship) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा है कि शादीशुदा महिला दूसरे पुरुष के साथ पति- पत्नी की तरह रहती है तो इसे लिव इन रिलेशनशिप नहीं माना जा सकता.

जिस पुरुष के साथ रह रही है वह आईपीसी की धारा 494/495 के अंतर्गत अपराधी हैं. कोर्ट ने कहा कि परमादेश विधिक अधिकारों को लागू करने या संरक्षण देने के लिए जारी किया जा सकता है. किसी अपराधी को संरक्षण देने के लिए नहीं. यदि अपराधी को संरक्षण देने का आदेश दिया गया तो यह अपराध को संरक्षण देना होगा. कानून के खिलाफ कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति डॉ वाईके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने हाथरस निवासी आशा देवी व अर्विन्द की याचिका को खारिज करते हुए दिया है. याची आशा देवी महेश चंद्र की विवाहिता पत्नी है. दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ है. किन्तु याची अपने पति से अलग दूसरे पुरुष के साथ पति- पत्नी की तरह रहती है. कोर्ट ने कहा कि यह लिव इन रिलेशनशिप नहीं है वरन दुराचार का अपराध है. जिसके लिए पुरुष अपराधी है।

याची का कहना था कि वह दोनों लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं. उनके परिवार वालों से सुरक्षा प्रदान की जाए. कोर्ट ने यह भी कहा कि शादीशुदा महिला के साथ धर्म परिवर्तन कर लिव इन रिलेशनशिप में रहना भी अपराध है. जिसके लिए अवैध संबंध बनाने वाला पुरुष अपराधी है. ऐसे संबंध वैधानिक नहीं मानें जा सकते. कोर्ट ने कहा कि जो कानूनी तौर पर विवाह नहीं कर सकते उनका लिव इन रिलेशनशिप में रहना , एक से अधिक पति या पत्नी के साथ संबंध रखना भी अपराध है. ऐसे लिव इन रिलेशनशिप को शादीशुदा जीवन नहीं माना जा सकता. और ऐसे लोगों को कोर्ट से संरक्षण नहीं दिया जा सकता है।

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क्या बेटा या बेटी की संपत्ति पर माता-पिता का होता है अधिकार, जानें क्या कहता है भारतीय कानून

Law News: माता-पिता की संपत्ति में उनके बच्चों का अधिकार होता है। इसे लोग जानते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या माता-पिता बच्चों की संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकते हैं? आइए इसका जवाब जानते हैं।

भारत के कानूनों के अनुसार माता-पिता अपने बच्चों की संपत्ति पर दावा कर सकते हैं। इसके लिए कुछ खास नियम हैं। परिस्थितियों और बच्चे के जेंडर के आधार पर नियम अलग होते हैं।

बच्चों की संपत्ति पर माता-पिता के अधिकार

सामान्य तौर पर माता-पिता को कानून के तहत अपने बच्चों की संपत्ति पर स्वतः अधिकार नहीं होता है। कुछ खास मामले में वे इस पर दावा कर सकते हैं। 2005 में संशोधित हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में वे शर्तें बताई गईं हैं जिनके तहत माता-पिता अपने बच्चे की संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त कर सकते हैं। खासकर तब जब बच्चे की मौत बिना वसीयत के हो जाती है।

माता-पिता को बच्चे की संपत्ति पर अधिकार कब मिलता है?

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार यदि कोई वयस्क, अविवाहित बच्चा बिना वसीयत छोड़े मर जाता है तो माता-पिता को संपत्ति विरासत में मिलने का अधिकार है। इस स्थिति में भी माता-पिता को बच्चे की संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व नहीं मिलता है। माता और पिता दोनों को संपत्ति पर अलग-अलग और खास अधिकार दिए जाते हैं। उत्तराधिकार के अधिकार माता-पिता के बीच शेयर किए जाते हैं, लेकिन किसी एक को पूर्ण स्वामित्व नहीं दिया जाता है।

उत्तराधिकारी के रूप में मां को मिलती है प्राथमिकता

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में बच्चे की असामयिक मौत की स्थिति में मां को प्रथम उत्तराधिकारी माना जाता है। यदि बच्चे की बिना वसीयत के मौत हो जाती है तो उसकी मां को संपत्ति का पहला उत्तराधिकारी माना जाता है। पिता को संपत्ति पर दावा करने का हक रहता है। उसे दूसरा उत्तराधिकारी माना जाता है। यदि मां जीवित नहीं है या उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकती तो दूसरे उत्तराधिकारी के रूप में पिता के अधिकार प्रभावी हो जाते हैं।

बेटों और बेटियों के लिए अलग-अलग नियम

माता-पिता के अपने बच्चों की संपत्ति पर उत्तराधिकार के अधिकार भी इस बात पर निर्भर करते हैं कि बच्चा लड़का है या लड़की। अगर बेटा बिना वसीयत के मर जाता है तो मां पहली वारिस होती है, उसके बाद पिता। अगर मां की मृत्यु हो जाती है तो पिता अन्य संभावित उत्तराधिकारियों के साथ संपत्ति को समान रूप से शेयर करेगा।

अगर बेटी बिना वसीयत के मर जाती है तो उसकी संपत्ति मुख्य रूप से उसके बच्चों को विरासत में मिलती है, उसके बाद उसके पति को। मृतक बेटी के माता-पिता आमतौर पर उसकी संपत्ति के सबसे आखिर में वारिस होते हैं। अगर बेटी की शादी नहीं हुई है तो उसके माता-पिता को उसका उत्तराधिकारी माना जाता है।

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धर्म संसद मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा एक्शन, याचिकाकर्ता वकील प्रशांत भूषण को हाई कोर्ट भेजा

Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को गाजयाबाद में विवादित हिंदू साधु यति नरसिंहानंद द्वारा प्रस्तावित धर्म संसद के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में उत्तर प्रदेश प्रशासन पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार नफरत भरी भाषणों के खिलाफ कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया था और इस आयोजन में भड़काऊ भाषणों की आशंका जताई गई थी।

मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि वह याचिका पर विचार नहीं करना चाहती। बेंच ने अपने पहले के आदेशों को दोहराया जिसमें जिला अधिकारियों को सभी एहतियाती कदम उठाने का निर्देश दिया था। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को इस मुद्दे पर हाईकोर्ट से संपर्क करने का निर्देश दिया।

‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा, “हमारे पास अन्य मामले भी हैं जो उतने ही गंभीर हैं। यदि हम इस पर विचार करते हैं तो हम बाढ़ में डूब जाएंगे। आपको हाईकोर्ट से संपर्क करना होगा। हम इस पर विचार नहीं कर सकते।” कोर्ट ने इस मामले में वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से भी निगरानी रखने को कहा।

याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने आगे कहा कि नरसिंहानंद को इस शर्त पर जमानत मिली थी कि वह नफरत भरे भाषण नहीं देंगे। इसके बाद अदालत ने याचिकाकर्ताओं को जमानत रद्द करने के लिए हाईकोर्ट जाने को कहा।

अदालत ने कहा, “अगर आप सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं तो हाईकोर्ट से जमानत रद्द करने के लिए संपर्क क्यों नहीं करते? हम याचिकाकर्ताओं को उचित उपायों का लाभ उठाने के लिए खुला छोड़ते हैं। हम पहले के आदेश को भी दोहराते हैं कि कानून-व्यवस्था बनाए रखी जाए और सभी अधिकारी इसका पालन सुनिश्चित करें।”

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पूजा स्थल एक्ट पर टिप्पणी आकर फंसे पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़, जानें अब सफाई में क्या कहा

Chandrachud News: पिछले कई दिनों से पूजा स्थल एक्ट चर्चा में हैं। दो साल पहले पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़े विवाद पर सुनवाई करते हुए एक मौखिक टिप्पणी की थी, जिसको लेकर विपक्ष ने उनपर निशाना साधा था। उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा था कि इस एक्ट के तहत किसी भी पूजा स्थल का धार्मिक चरित्र का पता लगाना बैन नहीं है। इसके बाद संभल समेत कई मस्जिदों को लेकर कोर्ट में याचिकाएं दायर होने लगीं। अब बीते दिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐक्शन लेते हुए देश की सभी अदालतों को धार्मिक स्थलों और विशेषकर मस्जिदों और दरगाहों को लेकर दायर होने वाली याचिकों पर विचार करने या फिर कोई आदेश पारित करने पर रोक लगा दी। इसके बाद अब पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने सफाई दी है।

‘टाइम्स नाऊ’ के कार्यक्रम में पहुंचे पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा है कि पूजा स्थल एक्ट को लेकर सुनवाई के दौरान कही गई बात (टिप्पणी) कोर्ट में होने वाली चर्चा का हिस्सा थी और यह कोई अंतिम फैसला नहीं था। सिर्फ सुनवाई के दौरान की जाने वाली टिप्पणीभर ही थी। इंटरव्यू के दौरान पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, ”कोर्ट में किसी भी चर्चा को अदालत में होने वाले संवाद के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए। सच्चाई जानने के लिए वकीलों से सवाल पूछे जाते हैं। कभी-कभी जस्टिस वकील को विरोधाभासी स्थिति बताने के लिए डेविल्स एडवोकेट की भूमिका निभाते हैं। ये सच्चाई जानने के साधन हैं। यह कहना कि कोर्ट में की गई कोई टिप्पणी उसके अंतिम रुख को दिखाता है, यह कोर्ट में संवाद की प्रकृति के साथ अन्याय होगा।”

वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर दायर किए गए एक मामले की सुनवाई करते हुए पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने 21 मई, 2022 को मौखिक टिप्पणी करते हुए बताया था कि ऐसे विवादित पूजा स्थलों का सर्वे 1991 के पूजा स्थल एक्ट का उल्लंघन नहीं करता है। पूर्व सीजेआई के इसी टिप्पणी के बाद से ही राजस्थान की अजमेर से लेकर यूपी की संभल तक की मस्जिदों में केस दायर करने का रास्ता तैयार हो गया था। विपक्षी दलों ने भी पूर्व सीजेआई पर निशाना साधा था। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश् ने कहा था कि चंद्रचूड़ की मौखिक टिप्पणियों ने इस मुद्दे को और विवादास्पद बना दिया है। उन्होंने एक्स पर लिखा, ”चंद्रचूड़ द्वारा 2022 में की गई मौखिक टिप्पणियों ने भानुमति का पिटारा खोल दिया है।”

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