क़दम जो उठ चले हैं, रुकना इन्हें गँवारा नहीं.
हौंसले बुलंद हैं, कमज़ोर इस दफ़ा जज़्बा नहीं.
रंजिशों में महबूस रहा रूह हुर्रियत को तैयार है,
मुल्क मेरा अब जल्द ही आज़ाद है आज़ाद है.
शुरू हुआ जो सिलसिला ख़त्म होगा तब तक नहीं,
अश्क़ हर मफ़लूक के मिट जाएँगे जब तक नहीं.
चिराग़ की इस रोशनी को, जले रहना अभी कुछ और है.
मुलाक़ातें तूफ़ान से, बाक़ी अभी कुछ और हैं, बाक़ी अभी कुछ और हैं.
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