Latest News : तेलंगाना में BC समुदायों को मिलेगा 42% आरक्षण

Telangana: तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी (CM Revanth Reddy) ने अपने चुनावी वादे को निभाते हुए एक बड़ा सामाजिक निर्णय लिया है।

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जाति आधारित आरक्षण पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का विवादित बयान, पूछा, अंबेडकर फेल हो गए या आंबेडकरवादी

Shankaracharya Avimukteshwarananda on caste reservation: बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर पर संसद में गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर राजनीतिक हंगामा अभी थमा नहीं है। कांग्रेस के बाद आज बसपा सुप्रीमो मायावती के आह्वान पर बसपा इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन कर रही है। इस बीच ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने जाति आरक्षण पर बड़ा बयान दिया है।

उनका कहना है कि आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ 10 साल के लिए की गई थी। बाबा साहेब कभी नहीं चाहते थे कि लोग जीवन भर आरक्षण की बैसाखी के सहारे चलें। लेकिन लागू होने के 78 साल बाद भी जिस वर्ग के लिए इसे लागू किया गया था वह मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाया है। इसका मतलब है कि या तो अंबेडकर फेल हो गए हैं या फिर अंबेडकरवादी फेल हो गए हैं।

उन्होंने कहा कि लोगों को इसमें नहीं पड़ना चाहिए बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी चीजों से जुड़ी अपनी समस्याओं को उठाना चाहिए। बताया जा रहा है कि शंकराचार्य ने मीडिया से बातचीत के दौरान एक सवाल के जवाब में उक्त बातें कहीं। उन्होंने कहा, ’78 साल बीत गए। बाबा साहब अंबेडकर के संविधान की बात की जाती है। मुझे बताएं कि 78 साल में अंबेडकर के पीछे चलने वालों ने कितनी तरक्की की है। 10 साल के लिए आरक्षण दिया गया, 78 साल बीत गए, वो आरक्षण जारी है और उनके लोग इसके लिए लड़ रहे हैं कि इसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए। आरक्षण इसलिए नहीं दिया गया कि आप जीवन भर के लिए अपंग हो जाएं और आरक्षण की बैसाखी पर खड़े रहें।’

उन्होंने कहा- ‘अंबेडकर साहब ने आरक्षण इसलिए दिया ताकि आप इसका लाभ उठा सकें और समाज की मुख्यधारा में आ सकें। आप कहां तक आ पाए? हम अंबेडकर का नाम लेने वालों से पूछना चाहते हैं कि उन्होंने अंबेडकर की भावनाओं का कितना ख्याल रखा। अंबेडकर नहीं चाहते थे कि ये लोग जीवन भर, अगले दो सौ साल, हजार साल तक आरक्षण का आनंद लेते रहें। वह चाहते थे कि लोग आरक्षण की बैसाखी के सहारे चलें और मुख्यधारा में शामिल हों। 78 साल में आप लोग मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए। इसका मतलब है कि या तो अंबेडकर फेल हो गए या फिर अंबेडकरवादी फेल हो गए।’

शंकराचार्य ने कहा कि ‘हमारा कहना यह है कि इसमें मत जाइए। आपकी जो भी समस्याएं हैं, आपको शिक्षा नहीं मिल रही है, इसलिए शिक्षा की मांग कीजिए। आपको स्वास्थ्य नहीं मिल रहा है, इसलिए स्वास्थ्य की मांग कीजिए। आपको मुख्यधारा में नहीं लाया जा रहा है, कहीं न कहीं आपका अपमान किया जा रहा है, इस बात को उठाइए कि भाई जब समाज एक है तो भेदभाव नहीं होना चाहिए। यह ठीक है, लेकिन किसी ने अंबेडकर का सम्मान किया और किसी ने उनका अपमान किया। अब आप इसमें ढोल पीटते रहिए और राजनेता जो करना चाहते हैं, कर रहे हैं।’

शंकराचार्य का एयरपोर्ट पर रवि त्रिवेदी, यतींद्र चतुर्वेदी, कीर्ति हजारी शुक्ला आदि ने स्वागत किया। वहां से वे कचहरी में अधिवक्ताओं के एक कार्यक्रम में पहुंचे। फिर वे सड़क मार्ग से राजघाट पहुंचे। राजघाट से वे जल मार्ग से केदारघाट गए। शंकराचार्य 25 दिसंबर तक काशी में रहेंगे। शंकराचार्य ने यह भी कहा कि अनंत जन्मों के पुण्य कर्मों का फल मिलने पर काशी निवास जीव के लिए सुगम हो जाता है। काशीवासियों को धर्म का कठोरता से पालन करना चाहिए।

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दलित पिता और गैर दलित महिला के बच्चे बना सकते हैं एससी प्रमाणपत्र, जानें सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए गुरुवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। देश की सर्वोच्च अदालत ने दलित पुरुष और गैर-दलित महिला की शादी को निरस्त कर दिया। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि पति अपने नाबालिग बच्चों के लिए अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाणपत्र प्राप्त करें जो पिछले छह वर्षों से अपनी मां के साथ रह रहे हैं।

जस्टिस सूर्यकांत और उज्जल भुइयां की पीठ ने जूही पोरिया (पूर्व में जावलकर) और प्रदीप पोरिया को तलाक देते हुए कहा कि गैर-दलित महिला शादी के जरिए अनुसूचित जाति में शामिल नहीं हो सकती है। हालांकि दलित पुरुष से जन्मे उनके बच्चों को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त होगा। कोर्ट ने 2018 के एक फैसले को दोहराते हुए कहा, “जन्म के आधार पर जाति तय होती है और विवाह से जाति नहीं बदल सकती। केवल इस तथ्य के कारण कि महिला के पति अनुसूचित जाति समुदाय से हैं, उन्हें अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता है।”

मामले में दोनों के 11 वर्षीय बेटे और छह साल की बेटी के लिए एससी जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है। आपको बता दें कि दोनों 6 वर्षों से गैर-दलित मां के साथ रायपुर में अपने नाना-नानी के घर पर जीवन व्यतीत किया है। कोर्ट ने कहा कि मां-बाप के तलाक के बाद भी बच्चों को अनुसूचित जाति के तहत सरकारी शिक्षा और रोजगार के लाभ प्राप्त करने का अधिकार होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह छह महीनों के भीतर बच्चों के लिए अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र प्राप्त करें। इसके साथ ही पति को बच्चों की शिक्षा (पोस्ट-ग्रेजुएशन तक) के लिए सभी खर्च, जैसे प्रवेश शुल्क, ट्यूशन शुल्क और आवासीय खर्च उठाने का निर्देश दिया गया।

पति ने पत्नी और बच्चों के जीवनभर के मेंटिनेंस के तौर पर 42 लाख रुपये का एकमुश्त भुगतान किया है। इसके अतिरिक्त कोर्ट को रायपुर में पति का एक जमीन का प्लॉट भी पत्नी को सौंपने का आदेश दिया गया। इससे पहले पीठ ने पति को अगस्त 2024 तक पत्नी के लिए व्यक्तिगत उपयोग हेतु एक दोपहिया वाहन खरीदने का निर्देश दिया था।

बच्चों और पिता के बीच संबंध सुधारने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने महिला को निर्देश दिया कि वह बच्चों और उनके पिता के बीच संबंध सुधारने में सहयोग करे। इसके तहत बच्चों की पिता से समय-समय पर मुलाकात सुनिश्चित की जाए और छुट्टियों में उनके साथ समय बिताने की अनुमति दी जाए। पीठ ने दंपति द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ दायर क्रॉस-एफआईआर और अन्य मामलों को भी खारिज कर दिया।

आपको बता दगें कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 के तहत किए गए व्यापक हस्तक्षेप का एक और उदाहरण है। इसमें न केवल वैवाहिक विवाद को हल किया गया बल्कि बच्चों के अधिकार और उनके भविष्य की भी रक्षा की गई।

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