आतंकवाद विरोध: कश्मीर के मुश्ताक ने 300 आतंकियों को किया ढेर, जानें कैसे बने सेना के नायक
Kashmir News: कश्मीर के मुश्ताक अहमद भट की कहानी किसी जासूसी फिल्म से कम नहीं है। कभी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने वाले मुश्ताक ने भारत लौटकर आतंक का रास्ता छोड़ दिया। भारतीय सेना में शामिल होकर उन्होंने 300 आतंकियों को खत्म करवाया। कैप्टन के रूप में रिटायर हुए मुश्ताक ने कई युवाओं को आतंकवाद से मुख्यधारा में लाने में मदद की। उनकी वीरता और बलिदान प्रेरणादायक है।
आतंक की राह से वापसी
1980 के दशक में कश्मीर में हिंसा चरम पर थी। 18-19 साल की उम्र में मुश्ताक ने देखा कि बंदूक वालों का सम्मान होता है। परिवार की सुरक्षा की चाह में वे पाकिस्तान गए। वहां जमात-ए-इस्लामी के नेटवर्क ने उन्हें आतंक की ट्रेनिंग दी। अफगानिस्तान में हथियार और विस्फोटक बनाने की कठिन ट्रेनिंग ली। लेकिन जल्द ही उन्हें पाकिस्तान की दोहरी नीति का सच पता चला। इससे उनका आतंकवाद से मोहभंग हुआ।
डबल एजेंट की खतरनाक जिंदगी
1990 में कश्मीर लौटने पर मुश्ताक का आत्मसमर्पण आसान नहीं था। परिवार को धमकियां मिलीं। 1994 तक वे आतंकियों के दबाव में रहे। फिर उन्होंने जोखिम उठाकर सीमा सुरक्षा बल से संपर्क किया। डबल एजेंट बनकर उन्होंने आतंकियों के ठिकानों की जानकारी दी। 1994-1999 तक उन्होंने गुप्त रूप से सेना को सूचनाएं दीं। इस दौरान उनकी जान को दोनों पक्षों से खतरा था। उनकी बहादुरी ने कई हमले रोके।
कारगिल युद्ध में अहम भूमिका
मुश्ताक ने 1999 में कारगिल हमले की पूर्व सूचना देकर भारतीय सेना को सतर्क किया। उनकी खुफिया जानकारी ने युद्ध का रुख बदला और कई जिंदगियां बचाईं। उनकी विश्वसनीयता बढ़ने पर उन्हें 1994-95 में सेना में औपचारिक रूप से शामिल किया गया। डबल एजेंट के रूप में उनकी अनूठी स्थिति ने उन्हें आतंकवाद विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण बनाया। उनकी सूचनाओं से कई बंधकों को छुड़ाया गया और हमले नाकाम हुए।
300 आतंकियों का खात्मा
मुश्ताक ने आतंकियों की पहचान कर उन्हें निष्क्रिय करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि वे उन आतंकियों को निशाना बनाते थे जो नागरिकों की हत्या करते थे। 300 से अधिक आतंकियों को उन्होंने मौत के घाट उतरने में मदद की। उनकी रणनीति थी कि पहले आतंकियों की श्रेणियां बनाईं, फिर उनके ठिकानों पर सटीक कार्रवाई की। इस काम में उनकी जान को हमेशा खतरा बना रहा।
सेना में कैप्टन की भूमिका
मुश्ताक ने सेना में जूनियर कमीशंड ऑफिसर के रूप में शुरुआत की। बाद में उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नति मिली। रिटायरमेंट तक उन्होंने कई युवाओं को आतंकवाद छोड़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी खुफिया जानकारी और अनुभव ने सेना के डीरेडिकलाइजेशन मिशन को मजबूती दी। कई गुमराह युवाओं को मुख्यधारा में लाकर उन्होंने उन्हें नया जीवन दिया। उनकी कहानी साहस और देशभक्ति का प्रतीक है।
आतंकवाद से मुख्यधारा की ओर
मुश्ताक ने कई कट्टरपंथी युवाओं को आतंकवाद छोड़ने के लिए राजी किया। उन्होंने सेना में भर्ती होने में उनकी मदद की। उनकी जीवनी ‘द ब्रेवहार्ट्स’ में एस रामचंद्रन ने उनकी कहानी को बयां किया। मुश्ताक ने अपनी असली पहचान और तस्वीरें साझा करने की हिम्मत दिखाई। उनकी कहानी कश्मीर के युवाओं के लिए प्रेरणा है कि गलत रास्ते से वापसी संभव है।
परिवार की सुरक्षा थी प्रेरणा
मुश्ताक का मकसद आजादी का जुनून नहीं, बल्कि परिवार की सुरक्षा था। 1980 के दशक में कश्मीर में अराजकता थी। बंदूकधारी सत्ता का प्रतीक थे। मुश्ताक ने सोचा कि हथियार से वे अपने परिवार को बचा सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान में ट्रेनिंग के बाद उन्हें वहां की दोहरी नीति का एहसास हुआ। यह अनुभव उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। उन्होंने आतंक छोड़कर देश की सेवा को चुना।
पुलिस और सेना का विरोधाभास
मुश्ताक ने बताया कि स्थानीय पुलिस हमेशा उन्हें संदेह की नजर से देखती थी। लेकिन सेना ने उन पर भरोसा किया। सेना से पूछने पर उन्हें तुरंत पासपोर्ट जैसी सुविधाएं मिल सकती थीं। यह विरोधाभास उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा। फिर भी, उन्होंने सेना के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ जंग लड़ी। उनकी सूचनाओं ने कई आतंकी योजनाओं को नाकाम किया और कश्मीर में शांति की उम्मीद जगाई।
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