सोशल मीडिया ट्रेंड: महिलाओं को विलेन बनाने की होड़, सोनम-निकिता केस पर विवाद
Social Media News: हाल के दिनों में सोशल मीडिया ट्रेंड ने सोनम रघुवंशी, निकिता सिंघानिया और मुस्कान रस्तोगी जैसे मामलों को उछालकर महिलाओं को विलेन के रूप में पेश किया है। इन केसों में पतियों की हत्या के आरोपों ने लोगों को चौंकाया। लेकिन कुछ लोगों ने इसे आधार बनाकर सभी महिलाओं पर उंगली उठाई। यह धारणा बन रही है कि आधुनिक महिलाएं ऐसी ही हैं। सोशल मीडिया पर तुलसीदास और गौतम बुद्ध के उद्धरणों के साथ बहस छिड़ी है। यह प्रवृत्ति समाज में डर और अविश्वास फैला रही है।
अपराधों का सामान्यीकरण खतरनाक
सोनम रघुवंशी पर अपने पति राजा की हत्या का आरोप है। इसी तरह, निकिता सिंघानिया और मुस्कान रस्तोगी के मामलों ने भी सुर्खियां बटोरीं। इन घटनाओं को सोशल मीडिया ट्रेंड ने बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। कुछ यूजर्स ने लिखा, “सोनम ने फिर साबित किया कि महिलाएं बेवफा हैं।” लेकिन कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि एक महिला का अपराध पूरे समाज को बदनाम नहीं कर सकता। यह सामान्यीकरण पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाता है, जो सदियों से चली आ रही है।
सामाजिक ढांचे की सच्चाई
भारतीय समाज में महिलाओं को सम्मान देने की बात तो होती है, जैसे “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते”। लेकिन दूसरी ओर, कुछ ग्रंथ उन्हें नरक का द्वार भी बताते हैं। यह दोहरापन केवल भारत तक सीमित नहीं है। मध्य एशिया से रोमन साम्राज्य तक, महिलाओं को बराबरी का हक नहीं मिला। आधुनिकीकरण के साथ स्थिति बदली, लेकिन सोनम जैसे मामले सामाजिक दबावों को उजागर करते हैं। सोनम के पिता का दावा कि उनकी बेटी का कोई पुरुष मित्र नहीं था, यह दर्शाता है कि परिवारों में बेटियों की आजादी सीमित होती है।
शादी और सामाजिक दबाव
सोनम की शादी के वीडियो देखकर लगता है कि उसे परिवार से प्यार मिला। लेकिन शादी के फैसले में उसकी मर्जी शामिल नहीं थी। भारत में बेटियों को अच्छी शिक्षा और सुविधाएं दी जाती हैं, लेकिन जीवनसाथी चुनने का अधिकार अक्सर परिवार के पास रहता है। यह दबाव कई बार बगावत को जन्म देता है। सोनम ने कथित तौर पर अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपराध किया। यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का परिणाम हो सकता है, जो आजादी और नियंत्रण के बीच संतुलन नहीं बना पाती।
बदलाव की जरूरत
सोशल मीडिया पर सोशल मीडिया ट्रेंड ने इन मामलों को सामाजिक बहस का मुद्दा बना दिया। कुछ लोग इसे “कलयुग” कहकर पुरानी मानसिकता को दोहराते हैं। लेकिन समाज को समझना होगा कि महिलाओं को संपत्ति मानने की सोच बदलनी होगी। बेटियों को बराबरी का हक देना जरूरी है। जब तक हम सामंती मानसिकता से नहीं निकलेंगे, तब तक ऐसे विवाद और अपराध समाज को झकझोरते रहेंगे।
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