हिमाचल हाईकोर्ट: शिमला एसपी को झूठे शपथपत्र मामले में मिली बड़ी राहत, जानें अदालत ने क्या कहा

Himachal News: हिमाचल हाईकोर्ट ने शिमला एसपी संजीव कुमार गांधी को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने झूठा शपथपत्र दायर करने के मामले में उनकी माफी स्वीकार की। कारण बताओ नोटिस रद्द कर दिया गया। न्यायाधीश राकेश […]

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हिमाचल हाईकोर्ट: शिमला एसपी को झूठे शपथपत्र मामले में मिली बड़ी राहत, जानें अदालत ने क्या कहा

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हिमाचल हाईकोर्ट: टीजीटी संस्कृत भर्ती नियमों पर दिया बड़ा फैसला, जानें अभ्यर्थियों को क्या मिलेगा फायदा

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने टीजीटी संस्कृत (शास्त्री) भर्ती को 19 फरवरी 2025 से पहले के नियमों के ?

नुसार जारी रखने का आदेश दिया। खंडपीठ ने राज्य सरकार और एनसीटीई को नोटिस जारी किया। […]

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हिमाचल हाईकोर्ट: टीजीटी संस्कृत भर्ती नियमों पर दिया बड़ा फैसला, जानें अभ्यर्थियों को क्या मिलेगा फायदा

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने टीजीटी संस्कृत (शास्त्री) भर्ती को 19 फरवरी 2025 से पहले के नियमों के अनुसार जारी रखने का आदेश दिया। खंडपीठ ने राज्य सरकार और एनसीटीई को नोटिस जारी किया। या…

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हिमाचल हाईकोर्ट: सोहन लाल के डिओ नोट पर हुए तबादले पर लगाई अंतरिम रोक, अब देना होगा जवाब

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सुंदरनगर के पूर्व विधायक सोहन लाल के डीओ नोट पर किए गए तबादले पर ?

ंतरिम रोक लगा दी है। ?

दालत ने इस मामले में सरकार और सोहन लाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। […]

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हिमाचल हाईकोर्ट: सोहन लाल के डिओ नोट पर हुए तबादले पर लगाई अंतरिम रोक, अब देना होगा जवाब

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सुंदरनगर के पूर्व विधायक सोहन लाल के डीओ नोट पर किए गए तबादले पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने इस मामले में सरकार और सोहन लाल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा ह…

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जेबीटी शिक्षक: हिमाचल हाईकोर्ट ने खारिज की उच्च वेतनमान की मांग, जानें क्या है पूरा मामला

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जेबीटी शिक्षकों की उच्च वेतनमान की मांग को खारिज कर दिया। प्राइमरी अस्सिटेंट टीचर (पीएटी) के रूप में नियमित किए गए शिक्षकों को पहले दो साल तक कम वेतनमान मिलेगा। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवॉल दुआ ने सरकार के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि नियमितीकरण के बाद जेबीटी शिक्षक को 5910-20200+3000 ग्रेड पे मिलता है। इस फैसले से शिक्षकों की उम्मीदों को झटका लगा है।

कोर्ट का स्पष्ट फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती नियमों में प्रारंभिक वेतनमान स्पष्ट है। जेबीटी शिक्षक को दो साल की सेवा के बाद ही उच्च वेतनमान मिलेगा। याचिकाकर्ताओं को अन्य जेबीटी शिक्षकों की तरह ही वेतन दिया गया। कोर्ट ने उनकी याचिका को बिना आधार माना। नियमों को चुनौती नहीं दी गई थी। जेबीटी शिक्षक नियमितीकरण के बाद भी प्रोबेशन अवधि के कारण उच्च वेतन से वंचित रहे।

नियमितीकरण का इतिहास

याचिकाकर्ता 2003 से 2007 के बीच पीएटी योजना के तहत भर्ती हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में पंकज कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश मामले में उनके नियमितीकरण को मंजूरी दी। 5 अगस्त 2020 को सरकार ने पीएटी को जेबीटी के रूप में नियमित किया। शर्त थी कि प्रारंभिक वेतनमान लागू होगा। 14 अगस्त 2020 को नियमितीकरण पूरा हुआ। शिक्षकों ने तर्क दिया कि प्रोबेशन नियम उनके मामले में लागू नहीं होना चाहिए।

शिक्षकों की मांग और तर्क

याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि नियमितीकरण की तारीख से ही 10300-34800+4200 ग्रेड पे मिले। उन्होंने कहा कि भर्ती नियमों के अनुसार अनुबंध या कार्यकाल आधारित नियुक्तियों में प्रोबेशन लागू नहीं होता। दो साल तक कम वेतनमान ने उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया। जेबीटी शिक्षक लंबे समय से उच्च वेतन की मांग कर रहे थे। उनकी याचिका में नियमितीकरण के बाद भेदभाव का मुद्दा भी उठाया गया था।

कोर्ट का अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने सरकार के नियमितीकरण आदेश को वैध ठहराया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को बिना भेदभाव के वेतनमान दिया गया। नियमों में दो साल की प्रोबेशन अवधि स्पष्ट है। शिक्षकों की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया। यह निर्णय जेबीटी शिक्षकों के लिए निराशाजनक रहा। हिमाचल के शिक्षा क्षेत्र में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

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हिमाचल हाईकोर्ट: वन भूमि से हटाए जाएं सेब के बगीचे, अतिक्रमणकारियों से वसूली जाए लागत; रोकने पर जारी होंगे वारंट

Himachal News: हिमाचल हाईकोर्ट ने वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और बीसी नेगी की खंडपीठ ने वन विभाग को सेब के बगीचों को हटाने का आदेश दिया। यह कार्रवाई उन क्षेत्रों में होगी जहां अतिक्रमण हटाने के पहले आदेश जारी हुए थे। कोर्ट ने मानसून में स्थानीय वन प्रजातियों का पौधारोपण करने को कहा। यह कदम पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

पौधारोपण पर जोर

कोर्ट ने वन विभाग को निर्देश दिया कि सेब के पेड़ हटाने के बाद स्थानीय वन प्रजातियों का पौधारोपण किया जाए। इसके लिए गैर-सरकारी संगठनों और निजी व्यक्तियों की मदद ली जाए। हिमाचल हाईकोर्ट ने इस कार्य को युद्ध स्तर पर करने को कहा। मानसून को पौधारोपण के लिए उपयुक्त समय बताया गया। यह कदम वन क्षेत्रों को पुनर्जनन और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए उठाया गया है।

अतिक्रमणकारियों पर सख्ती

हिमाचल हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने की लागत अतिक्रमणकारियों से वसूलने का आदेश दिया। यह राशि भूमि राजस्व के बकाए के रूप में वसूली जाएगी। कोर्ट ने कहा कि कटाई, स्टंप हटाने और पौधारोपण का खर्चा अतिक्रमणकारियों से लिया जाए। यह कदम अवैध कब्जे को हतोत्साहित करने के लिए उठाया गया। कोर्ट ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और तेजी सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

पुलिस सहायता का निर्देश

कोर्ट ने हिमाचल सरकार के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को वन विभाग को पूरी सहायता देने का आदेश दिया। इसमें पुलिस सहायता भी शामिल है। हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा कि आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएं। यह निर्देश वन भूमि को अवैध कब्जे से मुक्त कराने और पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने कार्यान्वयन में बाधा डालने वालों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी।

जमानती वारंट और नोटिस

आदेशों के कार्यान्वयन में बाधा डालने वालों के खिलाफ कोर्ट ने सख्त कदम उठाए। ऐसे लोगों के लिए 25,000 रुपये के जमानती वारंट और जमानतदारों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाधा डालने वालों को दंडित किया जाएगा। यह कदम सरकारी कर्मचारियों के कार्य को सुचारू करने के लिए उठाया गया। अगली सुनवाई में प्रगति रिपोर्ट मांगी गई है।

त्वरित कार्रवाई का आदेश

कोर्ट ने राजस्व गांवों में सेब के पेड़ों को तुरंत हटाने का निर्देश दिया। इसकी प्रगति रिपोर्ट 14 जुलाई 2025 को होने वाली अगली सुनवाई में पेश की जाएगी। हिमाचल हाईकोर्ट का यह फैसला वन भूमि को संरक्षित करने और अवैध अतिक्रमण को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण और कानून के पालन पर जोर दिया।

#forestLand #HimachalHighCourt

हिमाचल हाई कोर्ट: राजन सुशांत और बेटे धैर्य के खिलाफ अवमानना आरोप तय, जानें कोर्ट ने क्यों लिया फैसला

Himachal Pradesh News: हिमाचल हाई कोर्ट ने पूर्व लोकसभा सांसद राजन सुशांत और उनके बेटे धैर्य सुशांत के खिलाफ आपराधिक अवमानना के आरोप तय करने का फैसला लिया। यह मामला 11 फरवरी को हाई कोर्ट परिसर से फेसबुक लाइव के दौरान न्यायपालिका की छवि धूमिल करने से जुड़ा है। कोर्ट ने दोनों की माफी को खारिज कर दिया। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। दोनों को 16 जुलाई को कोर्ट में पेश होने को कहा गया।

माफी पर कोर्ट का सख्त रुख

हिमाचल हाई कोर्ट ने राजन और धैर्य की माफी को अस्वीकार करते हुए कहा कि यह वास्तविक पश्चाताप से रहित है। कोर्ट के अनुसार, माफी जल्दी और स्पष्ट होनी चाहिए। इस मामले में माफी को बचाव का हथियार माना गया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसी माफी स्वीकार नहीं की जा सकती। दोनों पर कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने का आरोप है। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया।

11 फरवरी की घटना का विवरण

11 फरवरी को राजन सुशांत और धैर्य ने कथित तौर पर फेसबुक लाइव के जरिए हिमाचल हाई कोर्ट की छवि को नुकसान पहुंचाया। कोर्ट ने इसे आपराधिक अवमानना माना। 3 मार्च को स्वत: संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने दोनों को नोटिस जारी किया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने आरोप तय करने का फैसला लिया। यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश

हिमाचल हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्यायालय का अपमान करने वालों को माफी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने माफी को “कागजी” करार दिया। दोनों प्रतिवादियों को 16 जुलाई को कोर्ट में उपस्थित होने का आदेश दिया गया। यह फैसला न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हिमाचल हाई कोर्ट की वेबसाइट पर और जानकारी उपलब्ध है।

#ContemptCase #HimachalHighCourt

पितृत्व अवकाश: हिमाचल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अनुबंध कर्मियों को भी मिलेगा लाभ

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुबंध कर्मियों के लिए पितृत्व अवकाश को लेकर बड़ा फैसला सुनाया। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि यह अवकाश हर पुरुष कर्मचारी का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने तकनीकी शिक्षा विभाग के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें अनुबंध कर्मियों को यह लाभ देने से इनकार किया गया था।

कोर्ट के निर्देश और नियमों में बदलाव

अदालत ने मुख्य सचिव को आदेश दिया कि अनुबंध पर कार्यरत पुरुष कर्मचारियों के लिए पितृत्व अवकाश का प्रावधान नियमों में शामिल करें। इसके साथ ही, अतिरिक्त महाधिवक्ता को इस फैसले की जानकारी संबंधित विभाग तक पहुंचाने और दो महीने में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा 31 जुलाई 2024 से 14 अगस्त 2024 तक लिए गए अवकाश को पितृत्व अवकाश माना जाए।

याचिकाकर्ता का मामला और नियम 43-ए

कोर्ट ने बताया कि बच्चे के जन्म के समय याचिकाकर्ता अनुबंध पर कार्यरत था। हालांकि, जब उसने पितृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया, तब वह नियमित कर्मचारी बन चुका था। नियम 43-ए के अनुसार, दो से कम बच्चों वाले पुरुष सरकारी कर्मचारी को बच्चे के जन्म से 15 दिन पहले या छह महीने के भीतर 15 दिनों का पितृत्व अवकाश मिल सकता है। इस नियम का हवाला देते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया।

ऐतिहासिक फैसले का प्रभाव

हिमाचल हाईकोर्ट का यह निर्णय अनुबंध कर्मियों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। इस फैसले से न केवल याचिकाकर्ता को राहत मिली, बल्कि अन्य अनुबंध कर्मचारियों के लिए भी समान अवसर सुनिश्चित हुए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी को उसके मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस आदेश की जानकारी हिमाचल प्रदेश सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध होगी।

#HimachalHighCourt #paternityLeave

हिमाचल हाईकोर्ट: शिक्षा विभाग के कर्मचारी ट्रांसफर में पुरानी पोस्टिंग जोड़ना वैध

Himachal News: हिमाचल हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के ट्रांसफर में उनकी पिछली तैनाती की अवधि जोड़ने को कानूनी करार दिया। खंडपीठ ने 27 अक्टूबर 2023 के कार्यालय ज्ञापन को वैध ठहराया। यह फैसला अनुराग चड्डा बनाम हिमाचल प्रदेश मामले में एकल जज के निर्णय को निरस्त करते हुए आया। अदालत ने कहा कि यह नीति सरकार की 10 जुलाई 2013 की ट्रांसफर पॉलिसी और सांविधिक नियमों के अनुरूप है।

खंडपीठ का महत्वपूर्ण फैसला

न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हिमाचल हाईकोर्ट का यह निर्णय शिक्षा विभाग के ट्रांसफर मामलों में अंतिम होगा। खंडपीठ ने एकल जज के फैसले को पलटते हुए कहा कि पुरानी पोस्टिंग की अवधि जोड़ना न केवल कानूनी है, बल्कि न्यायसंगत भी है। यह फैसला कर्मचारियों के ट्रांसफर प्रक्रिया को पारदर्शी बनाएगा।

याचिकाकर्ता की दलील

टीजीटी अध्यापक मोनिका कटणा ने अपने ट्रांसफर आदेश को चुनौती दी थी। उन्हें कांगड़ा से चंबा स्थानांतरित किया गया। मोनिका ने दावा किया कि उनकी पिछली सेवा अवधि को जोड़ना गलत है। उन्होंने अनुराग चड्डा मामले का हवाला दिया। हालांकि, हिमाचल हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। अधिक जानकारी के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार की वेबसाइट देखें।

एकल जज का पुराना फैसला

न्यायाधीश रंजन शर्मा ने अनुराग चड्डा मामले में कहा था कि पुरानी पोस्टिंग की अवधि जोड़ना 2013 की ट्रांसफर नीति के खिलाफ है। उन्होंने ट्रांसफर आदेश को रद्द कर दिया था। लेकिन खंडपीठ ने इस फैसले को गलत ठहराया।

ट्रांसफर नीति पर प्रभाव

यह फैसला शिक्षा विभाग में ट्रांसफर प्रक्रिया को और स्पष्ट करेगा। हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार की नीति को मजबूत करते हुए कर्मचारियों के लिए निष्पक्षता सुनिश्चित की है।

Author: Harikrishan Sharma, Himachal Pradesh

#employeeTransfer #HimachalHighCourt

हिमाचल हाईकोर्ट: सहकारी समिति में सदस्यता पर बड़ा फैसला, कहा, पुत्र को नहीं किया जा सकता वंचित

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि हिमाचल हाईकोर्ट के आदेशानुसार किसी विवाहित पुत्र को सहकारी समिति की सदस्यता से सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि उसके परिवार के अन्य सदस्य किसी दूसरी सोसायटी में हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दो महीने में सदस्यता देने का निर्देश दिया।

कोर्ट का फैसला

न्यायाधीश संदीप शर्मा की पीठ ने सोसायटी के 12 दिसंबर 2023 के प्रस्ताव और रेगुलेटरी कमेटी के 13 फरवरी 2024 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सहकारी समितियां नए सदस्यों को शामिल करने से इन्कार नहीं कर सकतीं। याचिकाकर्ता को दो महीने में सदस्यता और कार्य प्रदान करने का आदेश दिया गया।

याचिकाकर्ता का मामला

याचिकाकर्ता ने लंबे समय से एक सहकारी समिति में सदस्यता के लिए आवेदन किया था। सोसायटी ने यह कहकर आवेदन खारिज किया कि उसकी मां और भाई पहले से बगल लैंड लूजर्स ट्रांसपोर्ट कोऑपरेटिव सोसायटी के सदस्य हैं। हिमाचल हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि परिवार के अन्य सदस्यों की सदस्यता याचिकाकर्ता के अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती।

भूमि अधिग्रहण का इतिहास

वर्ष 2000 में याचिकाकर्ता के पिता की दाड़लाघाट में अंबुजा सीमेंट प्लांट के लिए जमीन अधिग्रहित की गई थी। इसके चलते उनका परिवार भूमिहीन हो गया। अधिग्रहण के बाद पिता को सामग्री परिवहन का कार्य मिला। उनकी मां और भाई को बगल लैंड लूजर्स सोसायटी में सदस्यता दी गई, जिसके तहत वे वाहन चला रहे थे।

सोसायटी का प्रस्ताव

सोसायटी ने 12 दिसंबर 2023 के प्रस्ताव में नए सदस्यों की भर्ती पर रोक लगाई थी। हालांकि, उसी प्रस्ताव में 18 गैर-सदस्यों को वाहन चलाने की अनुमति दी गई। हिमाचल हाईकोर्ट ने इसे अनुचित ठहराया और कहा कि गैर-सदस्यों को अनुमति देने के बावजूद याचिकाकर्ता को वंचित करना गलत था।

कोर्ट के तर्क

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रेगुलेटरी कमेटी को सदस्यता के मामलों में फैसला लेने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार सहकारी समिति के उपनियमों के अंतर्गत आता है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को सिर्फ इसलिए सदस्यता से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके परिवार के अन्य सदस्य दूसरी सोसायटी में हैं।

कानूनी प्रक्रिया

हिमाचल हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सहकारी समितियों के नियमों की व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि नए सदस्यों को शामिल करने से रोकना उपनियमों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता को दो महीने के भीतर सदस्यता और कार्य प्रदान करने का आदेश दिया गया।

सामाजिक प्रभाव

इस फैसले ने सहकारी समितियों में सदस्यता के नियमों पर नई बहस छेड़ दी है। कई लोग इसे भूमिहीन परिवारों के लिए राहत के रूप में देख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय सहकारी समितियों में पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देगा।

सहकारी समितियों की भूमिका

हिमाचल प्रदेश में सहकारी समितियां भूमिहीन परिवारों को रोजगार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। खासकर सीमेंट प्लांट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में भूमि अधिग्रहण के बाद प्रभावित परिवारों को परिवहन कार्य मिलता है। इस फैसले से ऐसी समितियों पर नियमों का पालन करने का दबाव बढ़ेगा।

याचिकाकर्ता की स्थिति

याचिकाकर्ता ने लंबे समय तक सदस्यता के लिए संघर्ष किया। कोर्ट के इस फैसले से उसे न केवल सदस्यता मिलेगी, बल्कि परिवहन कार्य में भी हिस्सेदारी मिलेगी। यह फैसला उन लोगों के लिए मिसाल बनेगा, जो समान परिस्थितियों में हैं।

कोर्ट का बयान

न्यायाधीश संदीप शर्मा ने कहा, “सहकारी समितियों को नए सदस्यों को शामिल करने से इन्कार नहीं करना चाहिए। यह फैसला निष्पक्षता और नियमों के पालन को सुनिश्चित करता है।” कोर्ट ने सोसायटी को जल्द से जल्द आदेश का पालन करने का निर्देश दिया।

आगे की प्रक्रिया

पुलिस अब सोसायटी के उपनियमों और रेगुलेटरी कमेटी के फैसलों की जांच कर रही है। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि भविष्य में इस तरह की गलतियां न हों। हिमाचल प्रदेश में सहकारी समितियों के नियमों को और स्पष्ट करने की मांग भी उठ रही है।

Author: Adv. Sajeev Dixit, Himachal Pradesh

#cooperativeSociety #HimachalHighCourt

करसोग वन मण्डल अधिकारी: चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को परेशान करने पर हाई कोर्ट ने ठोका 1 लाख का जुर्माना

Himachal News: करसोग वन मण्डल अधिकारी को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को गलत तरीके से परेशान करने का दोषी पाया। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने अधिकारी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। यह मामला कर्मचारी को 14 साल तक सेवा लाभों से वंचित रखने से जुड़ा है। कोर्ट ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की।

कोर्ट का फैसला और जुर्माना

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने करसोग वन मण्डल अधिकारी की अपील को खारिज करते हुए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा। एकल पीठ ने वन विभाग के दो अधिकारियों पर संयुक्त रूप से जुर्माना लगाया था। खंडपीठ ने प्रधान मुख्य अरण्यपाल को राहत दी, लेकिन करसोग वन मण्डल अधिकारी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने जानबूझकर गलत तथ्यों के आधार पर कर्मचारी की याचिका खारिज की। इसका मकसद कर्मचारी को उसके हक से वंचित करना था।

मामले का विवरण

कर्मचारी ने 1 जनवरी 2002 तक 8 साल तक 240 दिन प्रतिवर्ष की दिहाड़ीदार सेवा पूरी की थी। इसके आधार पर वह वर्क चार्ज स्टेटस का हकदार था। लेकिन वन विभाग ने उसे यह लाभ नहीं दिया। इसके बजाय, कर्मचारी से 14 साल तक दिहाड़ीदार के रूप में काम लिया गया और 1 अप्रैल 2008 को नियमित किया गया। विभाग ने दावा किया कि वन विभाग वर्क चार्ज संस्थान नहीं है। कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण और गैरकानूनी माना।

कोर्ट की टिप्पणी

एकल पीठ के न्यायाधीश बी सी नेगी ने वन विभाग की कार्यप्रणाली की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि विभाग ने कानून को अव्यवस्थित करने की कोशिश की। कर्मचारी को उसके सेवा लाभों से जानबूझकर वंचित रखा गया। खंडपीठ ने भी कहा कि करसोग वन मण्डल अधिकारी ने कर्मचारी के साथ अन्याय किया। यह व्यवहार न केवल गैरकानूनी था, बल्कि कर्मचारी के अधिकारों का हनन भी था।

कानूनी प्रावधान

यह मामला अपराध की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कोई धारा लागू नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने प्रशासनिक अनुशासनहीनता और भेदभाव को आधार बनाया। कर्मचारी सेवा नियमों के तहत वर्क चार्ज स्टेटस और बकाया लाभों का हकदार था। कोर्ट ने इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना। हिमाचल हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में पहले भी अधिकारियों पर जुर्माना लगाया है। उदाहरण के लिए, 2023 में एक मामले में शिमला के एक अधिकारी पर गलत कार्यवाही के लिए 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था।

X पर लोगों की प्रतिक्रियाएं

X पर करसोग वन मण्डल अधिकारी के खिलाफ कोर्ट के फैसले को लेकर कई प्रतिक्रियाएं आईं। एक यूजर (@hprights) ने लिखा, “निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ भेदभाव बर्दाश्त नहीं होना चाहिए। कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है।” एक अन्य यूजर (@justice4hp) ने कहा, “वन विभाग को अपनी नीतियां सुधारनी होंगी। कर्मचारियों के हक छीनना गलत है।” ये पोस्ट जनता में इस मामले को लेकर गुस्से और समर्थन को दर्शाती हैं।

हिमाचल में प्रशासनिक सुधारों की जरूरत

हिमाचल प्रदेश में कर्मचारी अधिकारों से जुड़े कई मामले कोर्ट में पहुंचे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, 2024 में शिमला में 12 से अधिक मामले कर्मचारी सेवा लाभों से जुड़े थे। विशेषज्ञों का कहना है कि वन विभाग जैसे सरकारी संस्थानों को पारदर्शी नीतियां अपनानी चाहिए। कर्मचारियों के साथ भेदभाव और गलत कार्यवाही से प्रशासन की विश्वसनीयता कम होती है। सरकार ने हाल ही में कर्मचारी कल्याण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे नियमितीकरण प्रक्रिया को तेज करना।

सामाजिक और कानूनी प्रभाव

यह मामला सरकारी विभागों में निचले स्तर के कर्मचारियों के साथ होने वाले भेदभाव को उजागर करता है। कोर्ट का फैसला कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक मिसाल है। हिमाचल सरकार ने कर्मचारी शिकायतों के लिए हेल्पलाइन नंबर 1100 शुरू किया है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि विभागों को नियमित ऑडिट और प्रशिक्षण की जरूरत है ताकि ऐसी घटनाएं न हों। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारी कल्याण पर ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करता है।

#HimachalHighCourt #KarsogForestOfficer