संविधान और कानून का हुआ उल्लंघन, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का किया गया घोर अपमान; पुलिस ने बिना बीएनएस की धारा के दायर की FIR
Mandi News: मंडी के चैल चौक में सरेआम दी गई बकरों की बलि वाली घटना ने प्रशासन, पुलिस और चुने हुए प्रतिनिधियों की पोल खोल दी है। इस एक मामले ने एक साथ कई मामले उजागर कर दिए है। फिर चाहे वह अवैध कब्जे का मामला हो, पुलिस की कार्यवाही करने का मामला हो, न्यायालयों के आदेशों की अवहेलना का मामला हो या फिर संविधान के प्रावधानों को सही से लागू करने का मामला हो, इन सभी मामलों में चैल चौक में बड़ा गड़बड़झाला चल रहा है।
यह मामला बुधवार को चैल चौक बाजार में सरेआम बकरों की बलि देने से शुरू हुआ। जहां सैकड़ों लोगों, बच्चों, प्रशासन, विधायक, पंचायत प्रधान, पुलिस और चुने हुए प्रतिनिधि के समक्ष इस वारदात को अंजाम दिया गया। किसी भी अधिकारी, पुलिस कर्मी या चुने हुए प्रतिनिधि ने इस वारदात को रोकने की कोशिश नहीं की। जिसके चलते पूरे इलाके की जमकर किरकिरी हो रही है।
कार्यक्रम में कई स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी, पुलिसकर्मियों की टीम, पंचायत प्रधान, विधायक, व्यापार मंडल का प्रधान और अन्य पदाधिकारी, देवता के साथ आए लोग, देवता का गुर-पुजारी, ढोल नगाड़ों वालों आदि समेत सैकड़ों लोग शामिल हुए। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि कानून के विरुद्ध स्कूल के सैकड़ों बच्चों को भी कार्यक्रम में शामिल किया गया। जबकि बच्चों को ऐसे किसी भी कार्यक्रम में ले जाने की अनुमति कानून देता ही नहीं है।
व्यापार मंडल ने किया था आयोजन
सूत्रों ने बताया कि इस कार्यक्रम का आयोजन व्यापार मंडल चैल चौक के पदाधिकारियों ने किया था और इलाके के हर दुकानदार से 1100 रुपए वसूले थे। सूत्रों ने बताया कि इस कार्यक्रम के लिए पांच लाख रुपए से ज्यादा इक्कठे हुए थे और लगभग 150 किलो बकरों के मांस की धाम बनाई गई थी।
सूत्रों ने कहा कि इस मामले की पीछे व्यापार मंडल के अध्यक्ष की बड़ी मंशा छुपी हुई है। व्यापार मंडल का अध्यक्ष चैल चौक पंचायत से अगली साल पंचायत प्रधान का चुनाव लड़ना चाहता है। जिसके लिए उसने स्थानीय लोगों को खुश करने के लिए देवता के नाम पर इस धाम का आयोजन किया था। इस मामले के वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि व्यापार मंडल के अध्यक्ष ने देवता की अगुवाई की थी और उनको लेकर चौक तक आए थे।
देवता की अगुवाई करते हुए व्यापार मंडल के अध्यक्षआपको बता दें कि व्यापार मंडल के प्रधान पर हाई कोर्ट में वन विभाग की जमीन पर जबरदस्ती कब्जा करके पार्क बनाने समेत कई केस न्यायालयों में चल रहे है। सूत्रों ने बताया कि व्यापार मंडल के अध्यक्ष को कई बार हाई कोर्ट से अलग-अलग मामलों में फटकारे पड़ चुकी है।
लोक निर्माण विभाग की जमीन पर कब्जा, हाई कोर्ट के आदेश
आपको बता दें कि हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट कई बार अपने आदेशों में कह चुका है कि अगर प्रदेश में कहीं भी सरकार या विभाग की जमीन पर अवैध कब्जा हुआ तो संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होंगे तथा उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही अमल में लाई जाएगी। लेकिन चैल चौक में तो लगता है जैसे कानून नाम की कोई चीज है ही नहीं। यहां हाइकोर्ट के आदेशों की कोई अहमियत नहीं है। लोगों, प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के कामों को देखकर लगता है कि उनको हाई कोर्ट के आदेशों की कोई परवाह ही नहीं है।
स्थानीय व्यापार मंडल, प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिसकर्मियों आदि सबने मिलकर लोक निर्माण विभाग की जमीन पर देवता स्थापित करके कब्जा करवा दिया और किसी ने रोकने की कोशिश तक नहीं की। सरेआम सैकड़ों लोगों के सामने देवता को लाया गया, बकरे काटे गए और देवता के नाम पर तोगड़े की स्थापना कर दी। यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि अगर कल को लोक निर्माण विभाग को जमीन वापस चाहिए होगी तो क्या लोक निर्माण विभाग जमीन को खाली करवाने के लिए कोर्ट के चक्कर लगाता रहेगा?
लोक निर्माण विभाग की जमीन पर कब्जाइस मामले में अधिशासी अभियंता लोकनिर्माण विभाग गोहर को तत्काल कार्यवाही करते हुए विभागीय जमीन की रक्षा करनी चाहिए थी लेकिन अधिशासी अभियंता ने इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं की और चैल चौक बाजार के ठीक बीच में करोड़ों की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा होने दिया। जबकि यह हाईकोर्ट के उन आदेशों का खुला उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि अगर कहीं कोई भी सरकारी जमीन पर कब्जा करता है तो उसमें विभागीय अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही होगी। ऐसे में अधिशासी अभियंता के खिलाफ कोर्ट की अवहेलना का मुकदमा बनता है।
अनुच्छेद 21 और 51A का घोर उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट ने बलि पर सुनवाई करते हुए कहा था कि अनुच्छेद 21 देश के सभी प्राणियों को जीवन का अधिकार देता है और यह अधिकार धर्म के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने बलि पर रोक लगाई थी। लेकिन यहां चैल चौक में लगता है कि ना तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश कोई मायने रखते है और ना ही संविधान के प्रावधान। इस तरह सरेआम बलि देना संविधान के अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि इस वारदात के समय जिन पुलिसकर्मियों की ड्यूटी चैल चौक के इस समारोह में आगे गई थी। उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और संविधान के अनुच्छेद 21 की पालना को सुनिश्चित नहीं किया।
बलि के लिए ले जाया जा रहा बकराचैल चौक में हुई वारदात संविधान के अनुच्छेद 51A का भी घोर उल्लंघन है। संविधान का अनुच्छेद 51A देश में किसी भी तरह के पाखंड और अंधविश्वास को फैलाने से रोकने और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का प्रावधान करता है। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिसकर्मियों का ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होना संविधान के अनुच्छेद 51A का घोर उल्लंघन है। जिसके लिए कार्यक्रम में उपस्थित सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होनी ही चाहिए।
हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना
आपको बता दें कि जब भी कोई भी अपराध सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालयों के आदेशों के विरुद्ध किया जाता है तो कोर्ट की अवमानना का मामला बनता है। ऐसे मामलों में छह महीने की जेल की सजा का प्रावधान है। फिर दोषी चाहे कोई भी हो।इस बकरों की बलि के मामले में भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना की गई है। हैरानी की बात है कि इन आदेशों की अवहेलना प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के उपस्थिति में हुई है। जब प्रशासन और पुलिस ही संविधान के प्रावधानों और अदालतों के आदेशों की पालना करने को तैयार नहीं है तो ऐसे हाल में कानून की रक्षा कौन करेगा?
ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन
इस कार्यक्रम के समय पुलिस की मौजूदगी में लोकल बसों, ट्रकों, कारों आदि सभी वाहनों को रोक दिया गया था। पूरे बाजार के सभी कोनों पर गाड़ियों का जाम लग गया था। जिसको दोबारा चालू करने के लिए लगभा एक से डेढ़ घंटे का समय लगा। जिसके चलते लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। गोहर पुलिस के अफसरों और जवानों ने मोटर व्हीकल एक्ट की सरेआम धज्जियां उड़ाई और जबकि कानूनन यह एक अपराध है।
विधायक की उपस्थिति में हुआ कार्यक्रम
आपको जानकर हैरानी होगी कि जमीन पर कब्जा करने, संविधान के प्रावधानों की धज्जियां उड़ाने और धार्मिक परम्पराओं के उल्लंघन का कार्यक्रम नाचन के विधायक विनोद कुमार की उपस्थिति में हुआ है। विधायक विनोद कुमार स्वयं धूप-बत्ती लेकर देवता की अगुवाई करते हुए मौके पर नजर आए। जबकि विधायक को इस मामले में कम से कम संविधान के प्रावधानों और कानून के पक्ष में खड़ा होना चाहिए था। विधायक को हाइकोर्ट और सुप्रीम के आदेशों का मान सम्मान करना चाहिए था। लेकिन मौके पर स्थिति इसके बिलकुल विपरीत नजर आई।
कार्यक्रम में देवता की अगुवाई आकृति हुए विधायक विनोद कुमारआपको बता दें कि इस कार्यक्रम में स्थानीय पंचायत के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। प्रधान चैल चौक पंचायत ने मीडिया को बयान देते हुए कहा कि तोगड़े की स्थापना का कार्यक्रम सफलता पूर्वक हुआ। जबकि उनको वहां पर संविधान के प्रावधानों, हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन होते नहीं दिखा।
स्कूली बच्चों की उपस्थिति
इस कार्यक्रम के दौरान चैल चौक स्कूल के बच्चों की उपस्थिति पूर्णतः गैर कानूनी थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस कार्यक्रम में पहली कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक के सभी बच्चे मौजूद थे। जबकि कानूनन इस तरह बच्चों को स्कूल समय में किसी भी कार्यक्रम के लिए नहीं ले जाया जा सकता। स्कूल प्रशासन ने वहां पर बच्चों को ले जाने कि अनुमति किसने और कैसे दी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। बच्चों के सामने हिंसा करना भी एक गंभीर अपराध है और कानून इसके बारे सख्त हिदायत देता है। आपको बता दें कि स्कूल के कई बच्चों ने सरेआम और खुले में बकरे की बलि होते हुए देखी।
कार्यक्रम में उपस्थित स्कूली बच्चेधार्मिक परम्पराओं की उड़ाई धज्जियां
इस कार्यक्रम में धार्मिक परम्पराओं की सरेआम धज्जियां उड़ाई गई। व्यापार मंडल के अध्यक्ष ने अपने निजी स्वार्थ के लिए धर्म की परम्पराओं का खुले आम उल्लंघन किया है। आपको बता दें कि जब भी किसी देवता के तोगड़े को स्थापना की जाती है तो उसको खुले आसमान के नीचे और ऐसे स्थान पर की जाती है जहां लोगों के आने-जाने, उठने-बैठने और सालाना समारोह को मनाने का पर्याप्त स्थान हो। लेकिन यहां देवता का तोहड़ा ऐसे स्थान पर लगा दिया जहां ना पर्याप्त स्थान है और सालाना समारोह मनाने के लिए खुला स्थान। ऊपर से देवता के तोगड़े की स्थापना एक मंदिरनुमा जगह में कर दी। जोकि हिंदू धर्म को परम्पराओं का घोर उल्लंघन है। उदाहरण के यहां के स्थानीय देवताओं जैसे देव महुनाग का तोगड़ा जंगल में खुले आसमान के नीचे स्थापित किया गया है।
पुलिस की कार्यवाही पर सवाल
इस मामले में पुलिस ने भले ही एफआईआर दर्ज कर दी हो। लेकिन यह एफआईआर पहली नजर में मामले की दबाने की कोशिश नजर आ रही है। पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ पशु क्रूरता अधिनियम की धारा 11 में धारा में एफआईआर दर्ज की है। जबकि बीएनएस की धारा 325 का लगाना बेहद जरूरी था। इस मामले में लोक निर्माण विभाग की जमीन पर कब्जा किया गया है। लेकिन पुलिस ने किसी भी धारा का उल्लेख नहीं किया। इतना ही नहीं इस मामले में छोटे बच्चों को हिंसा दिखाई गई। उसका भी पुलिस ने कहीं उल्लेख नहीं किया।
पुलिस का अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करना एक बड़ा सवाल पैदा करता है कि आखिर पुलिस की इस मामले में मंशा क्या है? एक तो ऐसे मामलों कोई भी व्यक्ति सामने आकर आवाज नहीं उठाता, दूसरा अगर कोई व्यक्ति सामने आया है तो पुलिस ने एफआईआर में कोताही क्यों बरती? जबकि शिकायतकर्ता ने शिकायत में बाकायदा व्यापार मंडल, देवता के साथ आए लोगों, मौके ओर उपस्थित पुलिस टीम और स्कूल के बच्चों को लाने वाले अध्यापकों का जिक्र किया है।
इस मामले में पुलिस ने एफआईआर में जमीन पर अवैध कब्जा करने, हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमाना, संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन, समेत कई कई मामलों से संबंधित धाराओं का उल्लेख नहीं किया और न आरोपियों के खिलाफ नामजद मामला दर्ज किया।
क्या है मामला
वीरवर को मंडी के चैल चौक शहर में एक देवता की स्थापना का समारोह आयोजित किया गया। वहां कार्यक्रम में सरकारी स्कूल चैल चौक के पहली से 12वीं कक्षा तक के बच्चों को बुलाया गया तथा कानून के विरुद्ध उनसे देवता का स्वागत करवाया। इसी दौरान चैल चौक के मुख्य चौक के चबूतरे पर प्रशासनिक अधिकारियों, चुने हुए प्रतिनिधियों, पुलिस कर्मियों, विभिन्न विभाग के अधिकारियों, स्कूली बच्चों आदि के सामने बकरे की बलि दी गई। जब इस कार्यक्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए तो राइट फाउंडेशन के अध्यक्ष ने इस बारे एफआईआर दर्ज करने के लिए मुख्यमंत्री, डीजीपी हिमाचल प्रदेश और एसपी मंडी को शिकायत की। जिस पर कार्यवाही करते हुए पुलिस ने तत्काल पशु क्रूरता अधिनियम की धारा 11 में एफआईआर दर्ज की।
क्या कहते है शिकायतकर्ता
इस मामले में राइट फाउंडेशन एनजीओ के अध्यक्ष सुरेश कुमार ने कहा कि मैं पुलिस की कार्यवाही से कतई संतुष्ट नहीं हूं। पुलिस ने इस मामले में दोषी व्यक्तियों को बचाने की पूरी कोशिश की है। उन्होंने कहा कि मैं पहले मंडी पुलिस की कार्यवाही देखना चाहता हूं। अगर वह सही से कार्यवाही करते है तथा दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का इंतजाम करते है तो ठीक है। अन्यथा में कोर्ट के आदेशों की अवहेलना, संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन आदि के खिलाफ सीधे हाई कोर्ट में याचिका दायर करूंगा। ताकि मासूम और निर्दोषों जानवरों के हत्यारों को सजा मिल सके और इस वारदात में शामिल सभी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भी कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो सके।
राइट फाउंडेशन के अध्यक्ष में मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश व पुलिस महानिदेशक में मांग की है कि इस मामले में तत्काल संबंधित अधिकारियों का तबादला किया जाए और जांच कम से कम पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी से करवाई जाए। ताकि कोई भी दोषी इस मामले में बच न सके।
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