An Urdu poem by Gauhar Raza for our times.
दर्सगाहों पे हमले नए तो नहीं
इन किताबों पे हमले नए तो नहीं
इन सवालों पे हमले नए तो नहीं
इन ख़यालों पे हमले नए तो नहीं.
गर, नया है कहीं कुछ, तो इतना ही है
तुम नए भेस में लौट कर आए हो
तुम मेरे देस में लौट कर आए हो
पर है सूरत वही, और सीरत वही.
सारी वहशत वही, सारी नफ़रत वही
किस तरह से छुपाओगे पहचान को
गेरुए रंग में छुप नहीं पाओगे
दर्सगाहों पे हमले नए तो नहीं.
हमको तारीख का हर सफ़ा याद है (1)
टक्शिला हो के नालंदा तुम ही तो थे
मिस्र में तुम ही थे, तुम ही यूनान में
रोम में चीन में, तुम ही ग़ज़ना में थे.
अलाबामा पे हमला हमें याद है
बेल्जियम में तुम्हीं, तुम ही पोलैंड में
दर्सगाहों को मिस्मार करते रहे.
जर्मनी में तुम्हारे क़दम जब पड़े
तब किताबों की होली जलाई गई
वो चिली में क़यामत के दिन याद हैं
दर्सगाहों पे तीरों की बौछार थी
तुम ही हो तालिबान, तुम ही बोकोहराम
तुम ने रौंदा है सदियों से इल्म-ओ-हुनर
हम को तारीख़ का हर सफ़ा याद है. (2)