Kiki ا

@UrbanXpat
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Aao mil kar dhoond laaye 'koi wajah' phir se ek hone ki...

106 Days of lockdown in Kashmir.

Kashmir is the most militarized zone in the world, more than 700K troops present there.

8 Million people are still living without basic human rights and we don't even know how many "Major SP Sinha" are posted there.

#Kashmir
#India

A vacation is what you take when you can no longer take what you’ve been taking. The weather has changed, so I have decided to book myself a little break in the sunshine.
Will be less active for a week, Take care, everyone... 💕
The Arabic word for mulberries is “toot“ توت 😀
Koi deewaar nahi, dar nahi, to kya ghar nahi?
Banjaaron se seekho, yehaan koi bhi beghar nahi..
Tamaam banjaaron ko Salam..💕

An Urdu poem by Gauhar Raza for our times.

दर्सगाहों पे हमले नए तो नहीं
इन किताबों पे हमले नए तो नहीं
इन सवालों पे हमले नए तो नहीं
इन ख़यालों पे हमले नए तो नहीं.

गर, नया है कहीं कुछ, तो इतना ही है
तुम नए भेस में लौट कर आए हो
तुम मेरे देस में लौट कर आए हो
पर है सूरत वही, और सीरत वही.

सारी वहशत वही, सारी नफ़रत वही
किस तरह से छुपाओगे पहचान को
गेरुए रंग में छुप नहीं पाओगे

दर्सगाहों पे हमले नए तो नहीं.
हमको तारीख का हर सफ़ा याद है (1)

इस नई नस्ल को
सारे ख़ंजर परखने की तौफ़ीक़ है
इस नई नस्ल को
दस्त-ए-क़ातिल झटकने की तौफ़ीक़ है. (4)

टक्शिला हो के नालंदा तुम ही तो थे
मिस्र में तुम ही थे, तुम ही यूनान में
रोम में चीन में, तुम ही ग़ज़ना में थे.                      
     
अलाबामा पे हमला हमें याद है
बेल्जियम में तुम्हीं, तुम ही पोलैंड में
दर्सगाहों को मिस्मार करते रहे.

जर्मनी में तुम्हारे क़दम जब पड़े
तब किताबों की होली जलाई गई
वो चिली में क़यामत के दिन याद हैं
दर्सगाहों पे तीरों की बौछार थी
तुम ही हो तालिबान, तुम ही बोकोहराम
तुम ने रौंदा है सदियों से इल्म-ओ-हुनर
हम को तारीख़ का हर सफ़ा याद है. (2)

तुम तो अक्सर ही मज़हब के जमे में थे
फिर ये क्यों है गुमाँ, आज के दिन तुम्हें
धर्म की आड़ में, छुप के रह पाओगे
रौंद पाओगे सदियों की तहज़ीब को
हम को तारीख़ का हर सफ़ा याद है         

दरगाहों पे हमले हैं जब जब हुए
फिर से उट्ठी हैं ये राख के ढेर से
जब जलायी हैं तुम ने किताबें कहीं
हर कलाम बन गया, परचम-ए-इंक़लाब.

आज की नस्ल उठ्ठी है परचम लिए
हैं ये वाक़िफ़ तुम्हारे हर एक रूप से
तुम को पहचानती है हर एक रंग में (3)