Shah Kabeer

@Shah_Kabeer
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In love with poetry. Faiz, Jalib, Sahir, Iqbal, Ghalib and many more
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ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आक़ाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इन को एहसास-ए-ज़िल्लत दिला दे
कोई इन की सोई हुई दुम हिला दे

2/2

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कुत्ते

ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्ते
कि बख़्शा गया जिन को ज़ौक़-ए-गदाई
ज़माने की फटकार सरमाया इन का
जहाँ भर की धुत्कार इन की कमाई

न आराम शब को न राहत सवेरे
ग़लाज़त में घर नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो इक दूसरे को लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो

ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाक़ों से उकता के मर जाने वाले
मज़लूम मख़्लूक़ गर सर उठाए
तो इंसान सब सर-कशी भूल जाए

1/2

Recited this poem of Sumit Sapra. Do listen. Feedbacks welcome. https://anchor.fm/shah-kabeer6/episodes/Tumhi-the-wo-bheed-jis-ne-mera-ghar-jalaya-tha-e9qhqt
Tumhi the wo bheed jis ne mera ghar jalaya tha by Shah Kabeer • A podcast on Anchor

Writer: Sumit Sapra, Voice: Shah Kabeer

Anchor FM Inc.

कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हम ने ठानी और है

आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी और है

बार-हा देखी हैं उन की रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है

दे के ख़त मुँह देखता है नामा-बर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है

क़ाता-ए-एमार है अक्सर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी और है

हो चुकीं 'ग़ालिब' बलाएँ सब तमाम
एक मर्ग-ए-ना-गहानी और है

~ Mirza Ghalib

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार
बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी

चश्म-ए-क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार
ख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी

~ Bahadur Shah Zafar

#CAA

निकल घर से कमर को बांध और यलगार करना सीख
के अब हर ज़ुल्म की बुनियाद को मस्मार करना सीख

यहां पर अब तेरा खामोश रहना जान ले लेगा
ज़बाँ को खोल और दुश्मन से तू तकरार करना सीख

कभी ना भूलना तू तीन सौ तेराह का वारिस है
उठा एक शाख़े नाज़ुक और उसे तलवार करना सीख

फ़क़त ज़िक्र व तिलावत से ही आज़ादी नहीं मिलती
उठा शमशीर दुश्मन को ज़लील व ख़्वार करना सीख

कोई हस्सान उन मज़लूम से जा कर यही कह दे
न बुज़दिल बन तू पीछे मुड़ पलट के वार करना सीख

काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा ना'रा इंक़िलाब ओ इंक़िलाब ओ इंक़िलाब

Josh Malihabadi

किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी

Aarzoo Lakhnawi

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो

संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो

Jaan Nisaar Akhtar