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PM Modi अयोध्या में 25 नवंबर को राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण करेंगे पीएम मोदी - VR News Live

PM Modi अयोध्या में 25 नवंबर को राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण करेंगे पीएम मोदी

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IPS आचार्य किशोर कुणाल का कार्डियक अरेस्ट के कारण 74 साल की उम्र में हुआ निधन, राम मंदिर ट्रस्ट के थे सदस्य

Acharya Kishore Kunal Passed Away: रविवार को बिहार की राजधानी पटना से दुखद खबर सामने आई है। अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य आचार्य किशोर कुणाल का निधन हो गया है। किशोर कुणाल का हृदय गति रुकने से निधन हुआ है। किशोर कुणाल को आज सुबह कार्डियक अरेस्ट हुआ और उन्हें तुरंत महावीर वत्सला अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका निधन हो गया। आचार्य किशोर कुणाल महावीर मंदिर न्यास के सचिव थे।

आचार्य किशोर कुणाल ने 74 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली है। आचार्य किशोर कुणाल के पार्थिव शरीर को अस्पताल से उनके आवास लाया गया। यहां उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए कई हस्तियां मौजूद थीं। कई लोगों की आखें वहां नम नजर आईं। किशोर कुणाल बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी के समधी भी थे। उनके निधन से अशोक चौधरी भी काफी मर्माहत नजर आए।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूर्व आईपीएस अधिकारी और महावीर मंदिर न्यास समिति के संस्थापक सचिव आचार्य किशोर कुणाल के निधन पर दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा है कि आचार्य कुणाल के निधन से प्रशासनिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुई है।

किशोर कुणाल का जन्म 10 अगस्त 1950 को हुआ था। किशोर कुणाल ने अपनी स्कूली शिक्षा मुजफ्फरपुर जिले के बरुराज गांव से की थी। पटना विश्वविद्यालय से इतिहास और संस्कृत में उन्होंने ग्रेजुएशन किया। बाद में किशोर कुणाल गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी बने। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के तौर पर उनकी तैनाती पटना में भी हुई थी।

किशोर कुणाल ने गृह मंत्रालय में भी अपनी सेवा दी। 1972 में कुणाल गुजरात कैडर में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी बन गए । उनकी पहली पोस्टिंग आनंद में पुलिस अधीक्षक के रूप में हुई। 1978 तक वे अहमदाबाद के पुलिस उपायुक्त बन गए।

साल 2000 में सेवानिवृत्त होने के बाद किशोर कुणाल दरभंगा स्थित संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति बने। हालांकि, बाद में वो बिहार राज्य धार्मिक बोर्ड के प्रशासन बने। किशोर कुणाल अभी जिस विख्यात महावीर मंदिर न्यास समिति के सचिव थे वो समिति कई स्कूलों और कैंसर अस्पतालों का संचालन भी करती है।

महावीर ट्रस्ट ने महावीर कैंसर संस्थान और महावीर आरोग्य संस्थान की स्थापना की थी। इसके अलावा महावीर नेत्रालय की स्थापना भी की गई है जहां आंखों की समस्या से पीड़ित लोगों का इलाज किया जाता है। कई सामाजिक कार्यों से जुड़े रहने वाले किशोर कुणाल पटना में स्थित ज्ञान निकेतन स्कूल के संस्थापक भी थे।

किशोर कुणाल के सेवाकाल में पटना स्थित महावीर मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। किशोर कुणाल को जातिवादी धार्मिक प्रथाओं में सुधार लाने के लिए किए गए अहम कार्यों के लिए भी याद किया जाएगा।

क्या बोले डिप्टी सीएम

आचार्य किशोर कुणाल के निधन पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सह राजस्व मंत्री डॉ दिलीप कुमार जायसवाल, उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा सहित पार्टी के अन्य नेताओं ने शोक प्रकट किया है। भाजपा नेताओं ने कहा कि किशोर कुणाल के योगदान को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है।

बिहार के उप मुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने आचार्य किशोर कुणाल के निधन पर कहा कि यह बिहार के लिए अपूरणीय क्षति है। वैसे एक ऐसे प्रशासक थे जो अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पार्दशिता के साथ बिहार में कानून राज स्थापित करने का काम किया था। डिप्टी सीएम ने कहा कि आचार्य किशोर ने धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी कई अहम कार्य किया। बिहार की जनता उन्हें कभी भूल नहीं पाएगी। उनके कार्यों से समाज को आगे बढ़ाने में मदद मिली है।

JDU ने जताया शोक

किशोर कुणाल के निधन पर JDU ने भी शोक जताया है। जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने किशोर कुणाल के निधन पर कहा कि आचार्य किशोर कुणाल भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी थे। उन्होंने नौकरी छोड़ कर अध्यात्म का मार्ग चुना। यह भी उन्होंने समाज के लिए ही चुना। उन्होंने महावीर आरोग्य संस्थान, महावीर कैंसर संस्थान जैसे दर्जनों अहम संस्थान स्थापित किए। नैवेद्यम को उन्होंने राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने मंदिर से होने वाले आय से बेहतरीन काम किया है। जदयू प्रवक्ता ने कहा कि वो राम मंदिर ट्रस्ट से भी जुड़े थे और उन्होंने सीता-राम रसोई को चलाया जो काफी अहम है। उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

RJD प्रवक्ता ने कही यह बात

राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव ने महावीर न्यास परिषद के सचिव आचार्य किशोर कुणाल के निधन पर गहरी शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि राज्य के लिए अपूरणीय क्षति है। रविवार को जारी शोक संदेश में पार्टी के अन्य प्रमुख नेताओं ने भी आचार्य किशोर कुणाल के निधन पर शोक जताया।

राजद प्रवक्त मृत्युंजय तिवारी ने कहा, ‘आचार्य किशोर कुणाल का निधन एक दुखद और मर्माहत खबर है। किशोर कुणाल पूर्व आईपीएस अधिकारी थे। सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया वो याद रखा जाएगा। उन्होंने समाज के लिए स्कूल और अस्पताल की स्थापना की है। जब वो पटना के सीनियर एसपी थे तब उन्होने ईमानदारी से काम किया था और उस वक्त भी काफी चर्चित हुए थे।’

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पूर्व जस्टिस नरीमन को सुप्रीम कोर्ट के वकील दीपक साईं का तीखा जवाब, जानें राम मंदिर के बारे क्या कहा

Delhi News: पूर्व जस्टिस आर.एफ. नरीमन ने हाल ही में राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए थे। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर के अवशेष नहीं मिले थे। उनके इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी, वहीं कुछ लोगों ने इसका समर्थन भी किया था। जब पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि नरीमन अब जज की हैसियत से नहीं बोल रहे हैं। वह आजाद भारत के आजाद नागरिक हैं। इस आधार पर उन्हें कुछ भी कहने का अधिकार है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में हर पहलू पर विचार करता है।

उन्होंने कहा कि जस्टिस नरीमन के बयान पर प्रतिक्रिया देना मेरा कर्तव्य नहीं है। अब इस मामले में एक्टिविस्ट वकील के तौर पर मशहूर जे. साई दीपक ने भी बयान दिया है। उन्होंने एएनआई को दिए इंटरव्यू में इस बारे में विस्तार से बात की और जस्टिस नरीमन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, ‘एक संस्था का व्यक्ति यह कह रहा है कि मेरे जाने के बाद इसमें गिरावट आई है, यह दुखद है और कई बातें स्पष्ट करता है। यह कहना गलत है कि विवादित स्थल के नीचे कोई मंदिर नहीं मिला। यह कहना गलत था। जजमेंट पढ़िए। इलाहाबाद हाईकोर्ट का जजमेंट पढ़िए और फिर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट पढ़िए। उसमें लिखा है कि जब गुरु नानक वहां आए तो वहां मंदिर था और फिर जब कुछ साल बाद आए तो वहां मंदिर नहीं था। वहां क्या हुआ? कोई आपदा आई जिसमें मंदिर खत्म हो गया।’

उन्होंने कहा कि आपने पीढ़ियों के मन में अपनी संस्कृति को लेकर हीन भावना पैदा कर दी है। जब हाईकोर्ट ने खुदाई का आदेश दिया तो दूसरे पक्ष ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि इसकी क्या जरूरत थी। इतना डर ​​क्यों था? इसकी एक वजह थी। मस्जिद के खंभे खुद ही बता रहे थे कि वे मंदिर का हिस्सा थे। उन्होंने कहा कि बाबरी और राम मंदिर का विवाद आज का नहीं है और लंबी सुनवाई के दौरान कोर्ट में सब कुछ पेश किया गया। मेरा सवाल यह है कि ऐसे मामलों में दूसरा पक्ष खून-खराबे की बात क्यों करता है। कोर्ट है और आप वहां जाकर अपनी दलील रख सकते हैं। न्यायिक कार्यवाही के जवाब में पत्थरबाजी क्यों जरूरी है?

कितने मंदिर खोजे जाएंगे? इस सवाल पर दीपक साईं ने क्या कहा

कितने मंदिर खोजे जाएंगे? इस सवाल पर जे दीपक साईं ने कहा कि हम यह नहीं कहेंगे कि गली-गली में मंदिर ढूंढ़े जाएं, लेकिन मेरा मानना ​​है कि मथुरा, काशी में सर्वे होना चाहिए। इसके अलावा शक्तिपीठों और ज्योतिर्लिंगों के लिए भी ऐसा किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विष्णु शंकर जैन और उनके पिता हरि शंकर जैन ने इन मामलों में शानदार काम किया है। हमें ऐसे लोगों की ज्यादा से ज्यादा जरूरत है। विष्णु जैन इस काम में पूरी तरह लगे हुए हैं।

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युवती ने रामराजा मंदिर के सामने भोजपुरी गाने पर किया अश्लील डांस, श्रद्धालु हुए परेशान; देखें वायरल वीडियो

Viral News: डिजिटल युग में रील्स बनाने का बढ़ता चलन सीमाएं तोड़ रहा है। लोग लाइक्स और कमेंट्स के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। लड़कियां पब्लिक प्लेस पर सेमी न्यूड होकर रील बना रही हैं। रील बनाने का ये बुखार मंदिर की सीढ़ियां भी चढ़ जा रहा है। लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं के केंद्र मध्य प्रदेश के ओरछा में रामराजा मंदिर के सामने एक युवती के अश्लील डांस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। युवती ने सफेद कपड़े पहनकर मंदिर के बाहर भोजपुरी गाने पर डांस किया। इस हरकत से श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुईं। घटना निवाड़ी जिले की है।

क्या है पूरा मामला

निवाड़ी जिले के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल ओरछा के रामराजा मंदिर में एक युवती द्वारा किए गए अश्लील डांस ने सबको हैरान कर दिया है। युवती ने मंदिर के पवित्र परिसर के ठीक सामने, सफेद कपड़े पहनकर एक भोजपुरी गाने पर आपत्तिजनक डांस किया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। लोग इस हरकत की कड़ी निंदा कर रहे हैं।

यहां देखें VIDEO-

https://twitter.com/RightNewsIND/status/1868528249929974055?t=eKXyb2kWhbF9SbzyPK3Q8w&s=19

खतरनाक है ये चलन

यह घटना डिजिटल युग के उस खतरनाक चलन को उजागर करती है, जहां लोग सोशल मीडिया पर लाइक्स और कमेंट्स पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। वे न तो जगह देखते हैं और न ही समय। बस मोबाइल फोन निकालकर वीडियो बनाना शुरू कर देते हैं। इस मामले में भी युवती ने मंदिर की पवित्रता का ख्याल नहीं रखा और वहां अश्लील डांस करके श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठोकर मारी।

युवती भोजपुरी गाने पर अश्लील डांस कर रही है। मंदिर में दर्शन करने आए श्रद्धालुओं का ध्यान उसकी हरकतों की तरफ गया। लोग वीडियो में युवती को देखकर चर्चा करते हुए भी दिखाई दे रहे हैं।

देश-विदेश से दर्शन के लिए आते हैं श्रद्धालु

ओरछा का रामराजा मंदिर अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता के लिए जाना जाता है। देश-विदेश से लोग यहां दर्शन करने आते हैं। इस घटना ने मंदिर की गरिमा को ठेस पहुंचाई है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है।

इंदौर के बाजार में ब्रा पहन घूमी थी लड़की

कुछ महीने पहले इंस्टाग्राम पर एक लड़की ने ब्रा पहन कर बाजार में घूमते हुए रील पोस्ट की थी। वीडियो इंदौर का था। यह इंटरनेट पर खूब वायरल हुआ था। इस पर खूब राजनीति भी हुई। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय समेत कई नेताओं ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराया। हालांकि बाद में लड़की ने अपने किए के लिए माफी भी मांग ली थी।

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मध्य प्रदेश के ओरछा में रामराजा मंदिर के बाहर एक युवती का अश्लील डांस वीडियो वायरल हो रहा है। युवती ने सफेद कपड़े पहनकर भोजपुरी गाने पर डांस किया। प्रशासन लड़की को ढूंढ कर कार्रवाई की बात कर रहा है।

X (formerly Twitter)

पूर्व जज के राम मंदिर पर दिए बयान से मचा बवाल, आज तक एएसआई ने सार्वजनिक नहीं की रिपोर्ट; जानें क्यों

Ram Mandir and Babri Masjid: सुप्रीम कोर्ट पूर्व जज जस्टिस आरएफ नरीमन ने राम मंदिर को लेकर एक ऐसा बयान दिया है, जिसको लेकर विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने कहा है कि राम मंदिर और बाबरी मस्जिद की कानूनी लड़ाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था वह सेकुलरिज्म के सिद्धातों के खिलाफ था। उन्होंने इसे न्याय का मजाक करार दिया और कहा कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने ये बात मानी थी कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई राम मंदिर नहीं था। पूर्व जज के दावों को जानने के लिए हमने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उस रिपोर्ट को समझने की कोशिश की है, जिसके आधार पर राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया गया था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 2003 में अयोध्या के तत्कालीन विवादित स्थल पर खुदाई का काम किया था। इसकी शुरुआत ग्राउंड-पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक से हुई थी। इसका उद्देश्य जमीन के नीचे किसी संभावित ऐतिहासिक संरचना या मानव निर्मित वस्तु की पहचान करना था। जीपीआर तकनीक से मिले संकेतों को अनुमानित अनियमितताएं कहा गया। इसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खुदाई की अनुमति दी।

12 मार्च 2003 को शुरू हुई यह खुदाई लगभग पांच महीने तक चली। 7 अगस्त 2003 को समाप्त इस कार्य में ASI की 14 सदस्यीय टीम को बढ़ाकर 50 से अधिक सदस्यों का बनाया गया। खुदाई स्थल पर सुरक्षा बल, स्निफर डॉग्स और अदालती मामले में शामिल 25 पार्टियों के प्रतिनिधि मौजूद रहते थे।

खुदाई में क्या मिला?

पुरातत्वविद् बीआर मणि की अगुवाई में हुई इस खुदाई में स्थल की परत-दर-परत जांच की गई। जैसे-जैसे टीमें जमीन के नीचे उतरीं विभिन्न कालखंडों की संरचनाएं सामने आईं। खुदाई की ऊपरी परतें 18वीं-19वीं सदी के मुगल काल की थीं। खुदाई में सुंग (1-2 शताब्दी ईसा पूर्व), कुषाण (1-3 शताब्दी), गुप्त (4-6 शताब्दी) और मौर्य (3-2 शताब्दी ईसा पूर्व) काल की संरचनाएं मिलीं। खुदाई के दौरान काले चमकीले बर्तनों (Northern Black Polished Ware) के अवशेष मिले, जिनकी तिथि 17वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जाती है।

बीआर मणि ने कहा, “इसके नीचे मुरायन काल (तीसरी से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) था। दिलचस्प बात यह है कि हमें उत्तरी काले पॉलिश वाले बर्तन के अवशेष मिले, जो एक शानदार प्रकार के मिट्टी के बर्तन थे और जो 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक मौजूद थे। लेकिन यहां हमने पाया कि यह 13वीं और 14वीं शताब्दी ईसा पूर्व से अस्तित्व में था। सबसे निचला स्तर 1680 ईसा पूर्व था।” मणि ने कहा कि इसका महत्व यह है कि यह इस स्थान के इतिहास को एक हज़ार साल पीछे ले जाता है।

बीआर मणि मानते हैं कि, “यह पहले के विद्वानों के विचारों का खंडन करता है जो सोचते थे कि अयोध्या का स्थल 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व का है। उत्खनन ने इसे 17वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक वापस ले गया है, जो कि उनके द्वारा पहले माने गए समय से कम से कम एक हजार साल पुराना है।”

क्या अयोध्या जन्मभूमि हमेशा से ही धार्मिक स्थल थी?

ये विवरण इसलिए दिलचस्प हैं क्योंकि इतने सालों बाद भी खुदाई पर एएसआई की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। इस स्थल का इतिहास 17वीं शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू होता है, लेकिन उस समय यह धार्मिक स्थल नहीं था। यहां नालियों, जल निकासी कुओं और चूल्हों के साक्ष्य मिले हैं, जो बताते हैं कि गुप्त काल तक यह एक आवासीय स्थल था।

इंडिया टुडे से बात करते हुए बीआर मणि ने कहा, “चौथी शताब्दी ईस्वी से हमें बहुत बड़ी संरचनाएं मिलनी शुरू हो गईं, जो या तो एक बड़े महल या एक बड़ी धार्मिक संरचना का संकेत देती हैं। वहां महल होने का कोई सबूत नहीं है, लेकिन मूर्तियां, टेराकोटा, लैंप और वास्तुशिल्प तत्व पाए गए हैं, जो आमतौर पर हिंदू, बौद्ध और जैन धार्मिक संरचनाओं में उपयोग किए जाते हैं। इसलिए यह मान लेना सुरक्षित है कि गुप्त काल के बाद से इस स्थल की प्रकृति एक आवासीय स्थल से बदलकर एक धार्मिक स्थल बन गई।” मणि कहते हैं, “9वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी तक हमें इस स्थल पर तीन अलग-अलग मंदिरों के साक्ष्य मिले हैं।”

इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को अपने फैसलों में महत्वपूर्ण माना। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कहा कि मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनाई गई थी और वहां पहले से एक मंदिर जैसी संरचना मौजूद थी।

बीआर मणि और उनकी टीम ने पुरातत्वीय प्रमाण जुटाए, जिन्होंने इस स्थल के इतिहास को 17वीं सदी ईसा पूर्व तक ले जाने का काम किया। मणि ने सरकार से रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की अपील की ताकि जनता को तथ्यात्मक जानकारी मिल सके।

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बाबरी के नीचे नहीं था राम मंदिर, फैसले को बताया ‘न्याय के साथ मजाक’; जानें और क्या बोले जस्टिस आरएफ नरीमन

Delhi News: पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आरएफ नरीमन ने बाबरी विवाद से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर अपनी असहमति जताते हुए कहा कि इन फैसलों में सेकुलरिज्म के सिद्धांत के तहत न्याय नहीं दिया गया। उन्होंने 2019 के ऐतिहासिक फैसले की भी आलोचना की, जिसमें विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण की अनुमति दी गई थी। जस्टिस नरीमन ने इसे ‘न्याय का बड़ा मजाक’ करार दिया और कहा कि इन फैसलों में सेकुलरिज्म को उचित स्थान नहीं दिया गया। जस्टिस नरीमन ने यह टिप्पणी “सेकुलरिज्म और भारतीय संविधान” विषय पर आयोजित प्रथम जस्टिस एएम अहमदी स्मृति व्याख्यान में की। उन्होंने बताया कि ‘खुद सुप्रीम कोर्ट ने ये बात मानी थी कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई राम मंदिर नहीं था।’ उन्होंने इस मामले से जुड़े पहले के फैसलों पर खुलकर बात की।

लिब्रहान आयोग और राष्ट्रपति संदर्भ पर टिप्पणी

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस नरीमन ने कहा, “”सबसे पहले सरकार ने लिब्रहान आयोग नियुक्त किया, जो निश्चित रूप से 17 वर्षों तक सोया रहा और फिर 2009 में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। दूसरा, इसने अयोध्या अधिग्रहण क्षेत्र अधिनियम और साथ ही सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति संदर्भ दिया, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मस्जिद के नीचे कोई हिंदू मंदिर था या नहीं।” उन्होंने इसे “भ्रामक और शरारतपूर्ण प्रयास” बताया।

1994 का इस्माइल फारूकी मामला

उन्होंने इस्माइल फारूकी बनाम भारत सरकार (1994) के फैसले का जिक्र किया, जिसमें अयोध्या क्षेत्र अधिग्रहण अधिनियम, 1993 की वैधता और राष्ट्रपति संदर्भ पर सुनवाई हुई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 67 एकड़ भूमि के अधिग्रहण को वैध ठहराया, लेकिन न्यायमूर्ति अहमदी ने असहमति जताते हुए कहा कि यह कानून सेकुलरिज्म के खिलाफ है।

2019 का राम जन्मभूमि फैसला

जस्टिस नरीमन ने राम जन्मभूमि मामले (2019) में अंतिम फैसले का भी जिक्र किया। इसमें तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया कि अयोध्या में 2.77 एकड़ की पूरी विवादित भूमि राम मंदिर के निर्माण के लिए सौंप दी जानी चाहिए। साथ ही, सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का आदेश दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि 1992 में मस्जिद का विध्वंस कानून का गंभीर उल्लंघन था। जस्टिस नरीमन ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा, “कोर्ट ने माना कि 1857 से 1949 तक मुसलमान वहां नमाज पढ़ते थे। लेकिन यह कहा गया कि वे इस स्थल पर ‘एकमात्र कब्जे’ का दावा नहीं कर सकते भले ही हिंदू पक्ष ने कई बार कानून के विपरीत कार्य किए हों। इसके बावजूद कोर्ट ने पूरा स्थल हिंदू पक्ष को सौंप दिया। यह न्याय का बड़ा मजाक है।”

जस्टिस नरिमन ने इस फैसले को लेकर कहा, “मस्जिद का निर्माण 1528 में हुआ था और यह तब से एक मस्जिद के रूप में अस्तित्व में थी। लेकिन 1853 में पहली बार इसमें विवाद हुआ। जैसे ही ब्रिटिश साम्राज्य ने 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता ली, एक दीवार को अंदर और बाहर के आंगन के बीच खड़ा किया गया। इस दीवार के बाद, अंदर के आंगन में मुस्लिम नमाज पढ़ते थे और बाहर के आंगन में हिंदू। यह तथ्य दर्ज है कि 1857 से लेकर 1949 तक दोनों पक्षों की प्रार्थनाएं होती रही थीं। लेकिन 1949 में कुछ लोग मस्जिद में घुसकर मूर्तियां स्थापित कर गए, जिसके बाद मुस्लिमों की प्रार्थनाएं रुक गईं।”

एएसआई रिपोर्ट और ऐतिहासिक संदर्भ

उन्होंने 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा तैयार रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि इस रिपोर्ट में विभिन्न धर्मों से संबंधित पुरावशेष पाए गए, जिनमें शैव, बौद्ध और जैन संस्कृतियों के चिन्ह भी थे। जस्टिस नरिमन ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने यह पाया था कि “कोई राम मंदिर बाबरी मस्जिद के नीचे नहीं था।” इसके बावजूद कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि मुस्लिमों के पास 1857 से 1949 तक के बीच विवादित स्थल पर “विशेष अधिकार” नहीं था, क्योंकि यह स्थान विवादित था। उन्होंने कहा, “कोर्ट ने माना कि इस स्थान पर हिंदू पक्ष ने कानून का उल्लंघन किया और इसलिए इस मामले में कोई एकतरफा दावा नहीं किया जा सकता था।”

सेकुलरिज्म की अनदेखी पर नाराजगी

जस्टिस नरीमन ने जोर देकर कहा, “हर बार हिंदू पक्ष ने कानून का उल्लंघन किया, लेकिन इसका परिणाम मस्जिद के पुनर्निर्माण के बजाय केवल वैकल्पिक भूमि देने के रूप में सामने आया। यह सेकुलरिज्म के साथ न्याय करने में असफलता है।” जस्टिस नरिमन ने इस बात पर जोर दिया कि हर बार जब कोई कानून का उल्लंघन हुआ, तो वह हिंदू पक्ष द्वारा हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि “क्या न्याय का सही पालन किया गया था? इस फैसले में किसी तरह से सेकुलरिज्म को सम्मान नहीं दिया गया, जो कि मेरी व्यक्तिगत राय में न्याय का एक बड़ा अपमान है।” उन्होंने यह भी कहा कि, “आखिरकार, जो ‘सुधार’ किया गया वह यह था कि मस्जिद को पुनर्निर्मित करने के बजाय सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए कुछ और भूमि दी गई।” उन्होंने बाबरी विध्वंस साजिश मामले का भी जिक्र किया, जिसमें सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। इस पर उन्होंने कहा, “जिन न्यायाधीश ने यह फैसला दिया, उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद उत्तर प्रदेश के उप-लोकायुक्त के रूप में नियुक्त किया गया। यह हमारे देश की स्थिति को दर्शाता है।”

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