जगुआर विमान: चुरू क्रैश दो पायलटों की मौत, फिर भी 2040 तक सेना का हिस्सा बन रहेगा यह विमान; जानें क्यों
Rajasthan News: भारतीय वायुसेना का जगुआर विमान बुधवार को चुरू जिले के भानुदा गांव के पास क्रैश हो गया। इस हादसे में दो पायलटों की जान चली गई। यह 2025 में जगुआर विमान का तीसरा हादसा है। भारतीय वायुसेना ने जांच के आदेश दे दिए हैं। स्थानीय लोगों ने जोरदार धमाके और खेतों में आग की लपटें देखीं। वायुसेना ने इस दुखद हादसे पर शोक जताया है।
तीसरा हादसा: जगुआर की विश्वसनीयता पर सवाल
यह हादसा इस साल मार्च के बाद तीसरा है। मार्च में अंबाला में एक जगुआर क्रैश हुआ, जहां पायलट सुरक्षित निकल गया। अप्रैल में जामनगर के पास हुए हादसे में एक पायलट की मौत हुई थी। चुरू में हुए इस हादसे ने जगुआर विमानों की उम्र और रखरखाव पर सवाल उठाए हैं। भारतीय वायुसेना अभी भी 115 जगुआर विमानों का इस्तेमाल कर रही है।
तेजस की देरी: जगुआर की मजबूरी
भारतीय वायुसेना 2040 तक जगुआर विमानों को सेवा में रखने की योजना बना रही है। स्वदेशी तेजस विमानों की डिलिवरी में देरी ने वायुसेना को पुराने विमानों पर निर्भर रहने को मजबूर किया है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड समय पर तेजस नहीं दे पा रहा। आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के कारण नए विमान आयात करना भी मुश्किल है। इसलिए, जगुआर को अपग्रेड कर उनकी सेवा लंबी की जा रही है।
परमाणु ताकत: जगुआर की अहमियत
जगुआर विमान भारत के परमाणु हथियार त्रिकोण का अहम हिस्सा है। यह कम ऊंचाई पर हमला करने में सक्षम है। ऑपरेशन सिंदूर में इसने पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक हमले किए। इसके पुराने रडार और एवियोनिक्स को इजरायली और अमेरिकी तकनीक से अपग्रेड किया जा रहा है। लगभग 60 विमानों में ड्रेन III वेरिएंट के साथ नई मिसाइलें लगाई जा रही हैं।
किफायती और भरोसेमंद: जगुआर का योगदान
जगुआर का रखरखाव आसान और किफायती है। इसका इंजन 30 मिनट में बदला जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर में इसने लंबी दूरी की हवाई लड़ाई में हिस्सा लिया। हालांकि, स्पेयर पार्ट्स की कमी एक चुनौती है। वायुसेना ने 2018 में 40 पुराने जगुआर खरीदे, जिनके पार्ट्स का इस्तेमाल हो रहा है। यह विमान अभी भी भारत की रक्षा रणनीति में अहम भूमिका निभा रहा है।