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मंडी जिले में वन अधिकार कानून 2006 के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों की प्रस्तुति और मान्यता पट्टे…

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में, वन संसाधन स्थानीय समुदायों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वन अधिकार कानून 2006 (अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006) का उद्देश्य उपनिवेशवादी और स्वतंत्रता-प्राप्त भारत में वन निवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना है। यह आलेख मंडी जिले में वन अधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को प्रस्तुत करने, मान्यता पट्टे प्राप्त करने की प्रक्रिया, और इस प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियों व समाधानों पर शोधपरक और सुझावात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह विश्लेषण 1915 के वन समझौते, 1927 के भारतीय वन अधिनियम, 1980 के वन संरक्षण अधिनियम, और 2002 की असफल नियमितीकरण मुहिम के संदर्भ में तैयार किया गया है, जिसमें हाल के ऑनलाइन स्रोतों से प्राप्त जानकारी शामिल है।

ऐतिहासिक संदर्भ: 1915 का वन समझौता:

1915 में, मंडी राज्य (अब मंडी जिला) में श्री व्राइट द्वारा किए गए वन समझौते ने वन भूमि का सर्वेक्षण और स्थानीय समुदायों के उपयोग अधिकारों, जैसे चराई, लकड़ी संग्रह, और गैर-लकड़ी वन उत्पादों, का दस्तावेजीकरण किया। ये दस्तावेज, जैसे वजीब-उल-अर्ज, वन अधिकार कानून 2006 के तहत दावों के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि वे पारंपरिक उपयोग और कब्जे को साबित करते हैं। मंडी में, जहां शासक अल्ला मालिक (सुप्रीम ओनर) और किसान अदना मालिक (टेनेंट) के रूप में दर्ज थे, ये रिकॉर्ड व्यक्तिगत खेती या सामुदायिक उपयोग के अधिकारों को मान्यता देने में सहायक हो सकते हैं। हिमाचल प्रदेश राज्य अभिलेखागार या भारतीय संस्कृति पोर्टल (https://www.indianculture.gov.in/) में ये दस्तावेज उपलब्ध हो सकते हैं।

वन अधिकार कानून 2006: प्रावधान और प्रासंगिकता:

वन अधिकार कानून 2006 अनुसूचित जनजातियों (FDST) और अन्य पारंपरिक वन निवासियों (OTFD) को व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार प्रदान करता है। व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) वन भूमि पर कब्जे और खेती से संबंधित हैं, जिसमें अधिकतम 4 हेक्टेयर भूमि का स्वामित्व शामिल है। सामुदायिक वन अधिकार (CFR) चराई, मछली पकड़ने, गैर-लकड़ी वन उत्पादों के संग्रह, और सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन को कवर करते हैं (https://www.drishtiias.com/to-the-points/Paper2/forest-rights-act-2006)। दावेदारों को यह साबित करना होता है कि वे 13 दिसंबर 2005 से पहले वन भूमि पर निर्भर थे। मंडी जिले में, जहां 79% आबादी कृषि और संबद्ध गतिविधियों, जैसे ईंधन लकड़ी और चारा, पर निर्भर है (https://hpmandi.nic.in/economy/), यह कानून आजीविका की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

मंडी जिले में दावों की प्रस्तुति और प्रक्रिया:

हिमाचल प्रदेश में, वन अधिकार कानून का कार्यान्वयन जनजातीय विकास विभाग द्वारा किया जाता है (https://himachalservices.nic.in/tribal/en-IN/forest-rights-act.html)। मंडी जिले में दावों की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में होती है:

  • दावा दाखिल करना: ग्राम सभा स्तर पर वन अधिकार समिति (FRC) व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को स्वीकार करती है। दावेदारों को 1915 के समझौता दस्तावेज, राजस्व रिकॉर्ड, या मौखिक गवाहियां जैसे साक्ष्य प्रस्तुत करने चाहिए (https://mpvanmitra.mkcl.org/)। FRC को यह सुनिश्चित करना होता है कि साक्ष्य का भौतिक सत्यापन दावेदारों और गवाहों की उपस्थिति में हो।
  • सत्यापन: FRC दावों और साक्ष्य की जांच करती है, जिसमें ऐतिहासिक दस्तावेजों की प्रामाणिकता शामिल है। ग्राम सभा में 2/3 कोरम के साथ खुली चर्चा आवश्यक है ताकि झूठे दावों को अस्वीकार किया जा सके।
  • उच्च समितियों की समीक्षा: सत्यापित दावे उप-मंडलीय स्तर समिति (SDLC) और जिला स्तर समिति (DLC) को भेजे जाते हैं, जो अंतिम निर्णय लेती हैं। सामुदायिक वन संसाधनों की सीमाओं के लिए आसपास की ग्राम सभाओं से समन्वय आवश्यक है।
  • मान्यता पट्टा: स्वीकृत दावों के लिए व्यक्तिगत या सामुदायिक अधिकार पत्र प्रदान किए जाते हैं, जो स्व-खेती, आवास, चराई, या वन संसाधन प्रबंधन के अधिकार प्रदान करते हैं (https://tribal.nic.in/FRA.aspx)।
  • कानूनी और प्रशासनिक बाधाएं;

    1927 का भारतीय वन अधिनियम और 1980 का वन संरक्षण अधिनियम FRA के कार्यान्वयन में बाधा डालते हैं। 1927 का अधिनियम वन भूमि को “आरक्षित” या “संरक्षित” के रूप में वर्गीकृत करता है, जिससे स्थानीय कब्जों को “अतिक्रमण” माना जाता है। 1980 का अधिनियम गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि के विचलन को प्रतिबंधित करता है, जिससे अधिकारों की मान्यता जटिल हो जाती है (https://www.himdhara.org/2019/01/28/submission-to-ministry-of-tribal-affairs-regarding-non-implementation-of-forest-rights-act-in-himachal-pradesh/)। हिमाचल प्रदेश में, वन विभाग ने दावा किया है कि ऐतिहासिक अधिकार पहले ही निपटाए जा चुके हैं, जिससे दावे खारिज हो सकते हैं।

    2002 की वन भूमि अतिक्रमण नियमितीकरण मुहिम, जो वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के प्रतिबंधों और कार्यान्वयन की कमी के कारण असफल रही, ने कब्जेदारों को उन्मूलन के खतरे में डाल दिया। मंडी जिले में अतिक्रमण के कई मामले विचाराधीन हैं, हालांकि सटीक संख्या उपलब्ध नहीं है। उदाहरण के लिए, 2007 से हिमाचल प्रदेश में 11,200 से अधिक अतिक्रमण मामले दर्ज किए गए, जिनमें मंडी भी शामिल है (https://timesofindia.indiatimes.com/city/shimla/removing-encroachment-from-forest-land-remains-a-challenge/articleshow/67249206.cms)। करसोग डिवीजन में हिमाचल हाई कोर्ट का उन्मूलन आदेश इस जटिलता को दर्शाता है (https://himbumail.com/bar-and-benches/himachal-high-court-orders-removal-of-forest)।

    मंडी जिले में वन अधिकार कानून के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत किए जाते हैं:

  • ऐतिहासिक दस्तावेजों का उपयोग: दावेदारों को हिमाचल प्रदेश राज्य अभिलेखागार, भारतीय संस्कृति पोर्टल, या ब्रिटिश लाइब्रेरी के इंडिया ऑफिस रिकॉर्ड से 1915 के समझौता दस्तावेज प्राप्त करने चाहिए। ये दस्तावेज व्यक्तिगत खेती और सामुदायिक उपयोग के अधिकारों को साबित करने में महत्वपूर्ण हैं।
  • जागरूकता और प्रशिक्षण: सिरमौर जिले की तरह (https://www.himdhara.org/2024/01/10/), मंडी में प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए, जिसमें ग्राम सभा, FRC, और स्थानीय प्रशासन शामिल हों। यह दावेदारों को दावा प्रक्रिया और साक्ष्य संग्रह के बारे में जागरूक करेगा।
  • कानूनी और तकनीकी सहायता: हिमधारा जैसे गैर-सरकारी संगठन (https://www.himdhara.org/) दावेदारों को कानूनी सहायता और नक्शे तैयार करने में मदद कर सकते हैं, क्योंकि ग्राम सभाओं में तकनीकी ज्ञान की कमी एक बड़ी बाधा है (https://testbook.com/hi/forest-rights-act)।
  • वन और राजस्व विभाग के साथ समन्वय: FRA के तहत अधिकारों की मान्यता के लिए वन और राजस्व विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना होगा। अतिक्रमण के रूप में वर्गीकृत कब्जों को FRA के तहत वैध माना जाना चाहिए।
  • डिजिटल संसाधन: दावेदारों को एम.पी. वनमित्र जैसे ऑनलाइन पोर्टल (https://mpvanmitra.mkcl.org/) का उपयोग करके दावे दर्ज करने और उनकी स्थिति की जांच करने की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। हिमाचल में भी ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जा सकता है।
  • सामुदायिक जुटाव: सामुदायिक वन संसाधन (CFR) दावों को प्रोत्साहित करने के लिए समुदायों को संगठित करना और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। आसपास की ग्राम सभाओं के साथ सीमा विवादों का समाधान SDLC के माध्यम से किया जाना चाहिए (https://mpvanmitra.mkcl.org/)।
  • पुनर्वास और विकास योजनाओं से एकीकरण: FRA के तहत मान्यता प्राप्त पट्टाधारकों को पीएम किसान योजना जैसे विकास कार्यक्रमों से जोड़ा जाना चाहिए (https://tribal.nic.in/FRA.aspx)।
  • मंडी जिले में वन अधिकार कानून 2006 के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों को प्रस्तुत करने और मान्यता पट्टे प्राप्त करने की प्रक्रिया में 1915 के वन समझौता दस्तावेज महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान कर सकते हैं। हालांकि, 1927 और 1980 के वन अधिनियम, अतिक्रमण के लंबित मामले, और 2002 की असफल नियमितीकरण मुहिम जैसी बाधाएं चुनौतियां पैदा करती हैं। इन बाधाओं को दूर करने के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों का उपयोग, जागरूकता अभियान, कानूनी और तकनीकी सहायता, विभागीय समन्वय, और डिजिटल संसाधनों का विकास आवश्यक है। मंडी के वन निवासियों के लिए, यह कानून उनकी आजीविका, सांस्कृतिक विरासत, और वन संसाधनों पर उनके पारंपरिक अधिकारों को सुरक्षित करने का एक शक्तिशाली साधन है। प्रभावी कार्यान्वयन के लिए स्थानीय समुदायों, प्रशासन, और गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग अपरिहार्य है।

    Author: Adv. Hem Singh Thakur, Mandi

    #forestRightsAct #MandiHistory

    இடதுசாரிகளின் முயற்சியால் 2006 ஆம் ஆண்டு வன உரிமைச் சட்டம் கொண்டு வரப்பட்டது. இந்தச் சட்டத்தை நீர்த்துப் போக செய்து பழங்குடியின மக்களை வனத்தை விட்டு வெளியேற்றும் நடவடிக்கையில் ஈடுபடுகிறது மோடி அரசு - தோழர் @[email protected] #CPIM #ForestRightsAct #TribalPeople
    வன உரிமைச்சட்டம் 2006 வழங்கியுள்ள மேய்ச்சல் உரிமைக்கு மாறாக உயர்நீதிமன்ற மதுரை கிளை தமிழகம் முழுவதும் மலைகளில் மாடுகளை மேய்க்க தடை தீர்ப்பை மறு ஆய்வுக்கு உட்படுத்த விவசாயிகள் சங்கம் வலியுறுத்தல் - தோழர் பெ.சண்முகம், தமிழ்நாடு விவசாயிகள் சங்கம் #ForestRightsAct #Madurai #HighCourt
    Attacking #tribal homelands.
    51 individual forest rights claims filed in 2007 under the #ForestRightsAct, 2006. All of them - except 3 - were rejected by the district-level committee (DLC).
    https://www.downtoearth.org.in/news/environment/covid-19-gujarat-forest-dept-officials-allegedly-torched-huts-fields-70426 #ModiMangalMessage
    COVID-19: Gujarat forest dept officials allegedly torched huts, fields

    The states forest officials told villagers to evict land or face consequences

    #JharkhandElection2019 #jharkhand #ForestRightsAct
    ---
    RT @[email protected]
    . @IndiaSpend report: The dissatisfaction of tribals in Jharkhand with the slow implementation of #ForestRightsAct could be a deciding factor in more than 62 of the 81 constituencies in the upcoming Assembly elections. Here’s why
    https://www.indiaspend.com/in-jharkhand-forest-rights-could-decide-votes-in-77-assembly-seats/
    https://twitter.com/LandConflicts/status/1200399010231488512
    In Jharkhand, Forest Rights Could Decide Votes In 77% Assembly Seats

    Tribals' dissatisfaction with the slow implementation of the Forest Rights Act (FRA), which provides for the formal recognition of forest-dwellers' land rights, could be a deciding factor in more than

    The Vidyut Daily

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    . @[email protected] report: The dissatisfaction of tribals in Jharkhand with the slow implementation of #ForestRightsAct could be a deciding factor in more than 62 of the 81 constituencies in the upcoming Assembly elections. Here’s why
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    🐦🔗: https://twitter.com/LandConflicts/status/1200399010231488512

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