लोकजीवन

@lokjivan
2 Followers
22 Following
26 Posts
'लोकजीवन' एक ऐसा मंच है, जहाँ जनसाधारण की आवाज़ों को प्राथमिकता दी जाती है, जो लोकतंत्र और जन पत्रकारिता की भावना को सजीव बनाता है। हमारा उद्देश्य संवाद को प्रोत्साहित करना, व्यवस्था को चुनौती देना, और सच्ची पत्रकारिता और विचारशील विमर्श के माध्यम से लोकतंत्र की नींव को मजबूत करना है। इस प्रयास को हमारे समर्पित और प्रतिबद्ध सदस्यों की टीम का समर्थन प्राप्त है, जो अपने ज्ञान, अनुभव, और सत्य व न्याय के प्रति निष्ठा से इस यात्रा को सफल बना रहे हैं।
मार्टर्स नेवर डाई https://lokjivan.in/martyrs-never-die/
मार्टर्स नेवर डाई - लोकजीवन

यह कहानी इतिहास और कल्पना के धागों से बुनी हुई है। मई क्रांति को आधार बनाकर लिखी गई यह कहानी उत्पीड़ितों के जीवन और उत्पीड़न से मुक्ति के संघर्ष का बयान करती है।

लोकजीवन
इन दिनों : मवालियों के पैने नख-दंत https://lokjivan.in/in-dinon-mavaaliyon-ke-paine-nakh-dant/
इन दिनों : मवालियों के पैने नख-दंत - लोकजीवन

"नफ़रत नयी दुनिया नहीं रच सकती। हिंसा सदा विध्वंस करती है। आज मनुष्य के अंदर जो व्याकुलता है, वह सामान्य व्याकुलता नहीं है। इस व्याकुलता ने मनुष्य के स्तर को बहुत नीचे गिरा दिया है, क्योंकि यह व्याकुलता में रचने की ख्वाहिश नहीं है। एक तरह से विध्वंस का आह्वान है।" - इसी आलेख से

लोकजीवन
इन दिनों : और चाँद चू गया https://lokjivan.in/in-dinon-aur-chaand-choo-gayaa/
चाँद प्रतीक है शांति का। चाँद आज भी उगता है, परंतु दुनिया बर्बर युद्धों और हथियारों के संग्रह में व्यस्त है। — सपने के बहाने आज के राजनीतिक हालात पर चिंता व्यक्त करता हुआ यह आलेख पढ़ें.
इन दिनों : और चाँद चू गया - लोकजीवन

"चाँद तो सूरज से रोशनी लेता है। आदमी भी एक-दूसरे से ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान ही तो आदमी की रोशनी है, वरना आठ जगहों से टेढ़े अष्टावक्र जनक के दरबारियों को चुनौती कैसे देता!" - इसी आलेख से

लोकजीवन
भारतीय भाषाओं को कितना खतरा है? https://lokjivan.in/bharatiy-bhashaon-ko-kitna-khatara-hai/
भाषाएँ समाप्त होने के ख़तरे की ओर बढ़ रही हैं। यह खतरा सभी भारतीय भाषाओं के ऊपर मँडरा रहा है। भाषा का मर जाना केवल भाषा का मर जाना नहीं होता है, बल्कि इतिहास, संस्कृति, शिक्षा और सभ्यता का मर जाना होता है। इस तरह यह मनुष्य की अस्मिता के आधार का मिट जाना होगा। ... गहरी चिंता से उपजे और अनेक तर्कों, उदाहरणों से समृद्ध इस विशेष लेख को पढ़ें और टिप्पणी करें।
भारतीय भाषाओं को कितना खतरा है? - लोकजीवन

"इस दस्तावेज़ में किया गया आकलन उन सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होता है, जिनका प्रयोग राज भाषाओं के रूप में हो रहा है। जो भारतीय भाषाएँ राजभाषाएँ नहीं हैं, उनकी दुर्दशा के बारे में तो बात न करना ही अच्छा होगा। इनमें से बहुत सी तो आखरी साँस ले रही हैं।"

लोकजीवन
भारतीय भाषाओं को कितना खतरा है? https://lokjivan.in/bharatiy-bhashaon-ko-kitna-khatara-hai/
भाषाएँ समाप्त होने के ख़तरे की ओर बढ़ रही हैं। यह खतरा सभी भारतीय भाषाओं के ऊपर मँडरा रहा है। भाषा का मर जाना केवल भाषा का मर जाना नहीं होता है, बल्कि इतिहास, संस्कृति, शिक्षा और सभ्यता का मर जाना होता है। इस तरह यह मनुष्य की अस्मिता के आधार का मिट जाना होगा। ... गहरी चिंता से उपजे और अनेक तर्कों, उदाहरणों से समृद्ध इस विशेष लेख को पढ़ें और टिप्पणी करें।
भारतीय भाषाओं को कितना खतरा है? - लोकजीवन

"इस दस्तावेज़ में किया गया आकलन उन सभी भारतीय भाषाओं पर लागू होता है, जिनका प्रयोग राज भाषाओं के रूप में हो रहा है। जो भारतीय भाषाएँ राजभाषाएँ नहीं हैं, उनकी दुर्दशा के बारे में तो बात न करना ही अच्छा होगा। इनमें से बहुत सी तो आखरी साँस ले रही हैं।"

लोकजीवन
इन दिनों : अजीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू, कहाँ ख़त्म… https://lokjivan.in/in-dinon-ajib-daastan-hai-ye-kahaan-shuru-kahaan-khatm/
जीवन समय की लहरों पर की गई एक यात्रा ही तो है। इसको समझाते हुए यह आलेख पढ़ें.
इन दिनों : अजीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू, कहाँ ख़त्म… - लोकजीवन

"यह सच है कि काल की चक्की चल रही है, एक दिन उस चक्की में पिसना ही है, मगर मनुष्य आख़िर सच्ची ख़ुशी कहाँ से लाये?" - इसी आलेख से

लोकजीवन
इन दिनों : छाती पीटने और हाय-हाय करने के चैम्पियन https://lokjivan.in/in-dinon-chhaati-pitane-aur-haay-haay-karne-ke-champian/
प्रधानमंत्री महिलाओं के आरक्षण के लिए 'हाय-हाय' नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी साज़िशों के नाकाम हो जाने के कारण कर रहे हैं। उनका असली मकसद क्या था, पढ़िए इस 'इन दिनों' के इस अंक में।
इन दिनों : छाती पीटने और हाय-हाय करने के चैम्पियन - लोकजीवन

"प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जानते थे कि जिस तरह की शर्तें वे महिला आरक्षण बिल में जोड़ रहे हैं, उन्हें विपक्ष स्वीकार नहीं करेगा। इन शर्तों को लागू करने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, जो उनके पास है नहीं। फिर उन्होंने अचानक लोकसभा की बैठक क्यों बुलाई?" - इसी आलेख से

लोकजीवन
इन दिनों : रोपे पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय https://lokjivan.in/in-dinon-rope-ped-babul-ke-to-aam-kahaan-se-hoe/
#Bihar #Politics #Castism #NitishKumar #SamratChaudhary
इन दिनों : रोपे पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से होय - लोकजीवन

"हर जाति ने अपने नायक ढूँढ लिया है। आज़ादी की लड़ाई में वैसे नायक ढूँढे जाते थे, जिन्होंने देश के लिए शहादत दी हो। अब जब खा-पीकर तगड़े हो रहे हैं तो देखादेखी हरेक जाति ने अपने-अपने नायकों की तलाश शुरू की।" - इसी आलेख से

लोकजीवन
इन दिनों : एक बार, जाल फेंक रे मछेरे https://lokjivan.in/in-dinon-ek-baar-jaal-fenk-re-machhere/
जीवन विस्थापन का अनवरत क्रम है। अपनी जड़ों से विस्थापन का जो क्रम शुरू होता है, वह जीवन से विस्थापन के रूप में विश्राम पाता है। जीवन के सबसे बड़े सत्य पर विमर्श करते हुए पढ़ें यह आलेख।
इन दिनों : एक बार, जाल फेंक रे मछेरे - लोकजीवन

"हर क्षण हम थोड़ा-थोड़ा जीते और मरते जाते हैं। जो चीज़ें छूट जाती हैं, वे मर ही तो जाती हैं। अपने अंदर मृत्यु हर वक़्त नाचती रहती है।" - इसी आलेख से

लोकजीवन
इन दिनों : संवैधानिक मताधिकार और चुनाव आयोग के ठहाके https://lokjivan.in/in-dinon-sanvaidhanik-mataadhikaar-aur-chunaav-aayog-ke-thahaake/
इन दिनों : संवैधानिक मताधिकार और चुनाव आयोग के ठहाके - लोकजीवन

"आज़ादी मिली तो भारतीयों को वयस्क मताधिकार मिला। संविधान ने गारंटी दी कि हर भारतीय को वोट देने का अधिकार है और सभी के वोट बराबर होंगे। संविधान के इस मूलभूत अधिकार को चुनाव आयोग ही नष्ट कर रहा है।" - इसी आलेख से

लोकजीवन