हाइपरसोनिक तकनीक: न रडार की पकड़ में आएगी और न नष्ट होगी, भारत की मिसाइल ने उड़ाई चीन-पाक की नींद
International News: अमेरिकी कंपनी उर्सा मेजर ने हाइपरसोनिक तकनीक में बड़ा कदम उठाया। स्ट्रैटोलॉन्च के Talon-A के लिए 32.9 मिलियन डॉलर में H13 इंजन बनाएगी। यह अमेरिकी रक्षा को मजबूत करेगा। भारत ने भी अप्रैल 2025 में DRDO के स्क्रैमजेट इंजन का 1,000 सेकंड तक परीक्षण किया। नवंबर 2024 में 1,500 किमी रेंज की हाइपरसोनिक मिसाइल का टेस्ट सफल रहा। वैश्विक दौड़ में दोनों देश आगे हैं।
हाइपरसोनिक मिसाइलों की खासियत
हाइपरसोनिक तकनीक मिसाइलों को ध्वनि से पांच गुना तेज बनाती है। मैक 5 (6,100 किमी/घंटा) की गति वाली ये मिसाइलें रास्ता बदल सकती हैं। बैलिस्टिक मिसाइलें पूर्वानुमानित रास्ते पर चलती हैं, लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइलें बूस्ट-ग्लाइड तकनीक से युद्धाभ्यास करती हैं। भारत की मिसाइल हवा, पानी और जमीन से हमला कर सकती है। स्क्रैमजेट इंजन हवा से ऑक्सीजन लेकर लंबी उड़ान भरता है। यह तकनीक रक्षा में क्रांति लाएगी।
भारत और वैश्विक दौड़
भारत की हाइपरसोनिक तकनीक यात्रा 2004 में शुरू हुई। DRDO ने 2020 में स्क्रैमजेट इंजन का प्रदर्शन किया। 2024 में 1,500 किमी रेंज की मिसाइल का टेस्ट हुआ। चीन की DF-27 और DF-17 मिसाइलें इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। अमेरिका भी पीछे नहीं है। हाइपरसोनिक मिसाइलें परमाणु-सशस्त्र देशों के लिए रणनीतिक ताकत हैं। भारत को चीन के खतरे से निपटने के लिए यह तकनीक जरूरी है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है।
चुनौतियां और भविष्य
हाइपरसोनिक तकनीक के विकास में उच्च तापमान और वायुमंडलीय घर्षण चुनौती हैं। कार्बन-कार्बन कंपोजिट जैसी सामग्री जरूरी है। भारत HAL और GE एयरोस्पेस के साथ F-414 इंजन उत्पादन की डील पर काम कर रहा है। यह तेजस मार्क 2 और AMCA के लिए होगा। हाइपरसोनिक मिसाइलें कम ऊंचाई और गतिशीलता के कारण ट्रैक करना मुश्किल हैं। भारत की प्रगति रक्षा क्षमता को नई ऊंचाई देगी। वैश्विक सुरक्षा में यह तकनीक निर्णायक होगी।
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