महाभियोग प्रस्ताव: जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई, इस्तीफा ही एकमात्र रास्ता?
India News: केंद्र सरकार ने जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह कदम दिल्ली हाई कोर्ट में उनके कार्यकाल के दौरान उनके आवास पर आग लगने की घटना के बाद उठाया गया है। आग में जली हुई नकदी की बोरियां मिली थीं। सुप्रीम कोर्ट की समिति ने जांच के बाद उन्हें दोषी ठहराया। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित किया गया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया। सरकार सभी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर यह प्रस्ताव संसद में लाएगी।
महाभियोग से बचने का रास्ता
जजों की नियुक्ति और हटाने के जानकारों का कहना है कि जस्टिस वर्मा के पास महाभियोग प्रस्ताव से बचने का एकमात्र विकल्प है। यदि वे प्रस्ताव पेश होने से पहले इस्तीफा दे देते हैं, तो वे पेंशन और अन्य सुविधाएं पाने के हकदार रहेंगे। संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत, हाई कोर्ट का जज राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस्तीफा दे सकता है। इसके लिए किसी की मंजूरी की जरूरत नहीं है। यदि जज इस्तीफे में कोई तारीख बताता है, तो वह तारीख से पहले इसे वापस भी ले सकता है।
संसद में प्रस्ताव की प्रक्रिया
जज इन्क्वायरी एक्ट 1968 के अनुसार, यदि संसद में महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है, तो लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा का सभापति तीन सदस्यों की जांच समिति बना सकता है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश, किसी हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ कानून विशेषज्ञ शामिल होता है। यह समिति जज के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करती है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि 21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र में यह प्रस्ताव दोनों सदनों में पारित हो जाएगा।
जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोप
मार्च 2025 में जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास पर आग लगी थी। इस घटना में उनके घर से जली हुई नकदी की बोरियां बरामद हुईं। जस्टिस वर्मा ने नकदी के बारे में अनभिज्ञता जताई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति ने गवाहों के बयान और सबूतों के आधार पर उन्हें दोषी पाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उन्हें इस्तीफा देने का सुझाव दिया था, लेकिन जस्टिस वर्मा ने इसे ठुकरा दिया। इसके बाद, सीजेआई ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महाभियोग की सिफारिश की।
महाभियोग का प्रभाव
यदि संसद में महाभियोग प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो जस्टिस वर्मा को न केवल उनके पद से हटाया जाएगा, बल्कि उनकी पेंशन और अन्य सुविधाएं भी छिन सकती हैं। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत होती है, जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को हटाने का प्रावधान करती है। महाभियोग की प्रक्रिया में लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है। यह भारत में दुर्लभ है, क्योंकि अब तक केवल कुछ ही मामलों में इस प्रक्रिया का उपयोग हुआ है।
सरकार का रुख
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजीजू ने सभी दलों से इस मुद्दे पर एकजुट होने की अपील की है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखना सरकार का प्राथमिक लक्ष्य है। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने के बाद उनके खिलाफ कोई न्यायिक जिम्मेदारी नहीं दी गई है। यह कदम उनके खिलाफ कार्रवाई की दिशा में पहला संकेत था। सरकार अब संसद के मानसून सत्र में इस मामले को तेजी से आगे बढ़ाने की योजना बना रही है।
ऐतिहासिक संदर्भ
भारत में जजों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया बेहद जटिल और असामान्य है। 1993 में जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन यह लोकसभा में पारित नहीं हुआ। जस्टिस वर्मा का मामला भी न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता के सवाल उठाता है। यह घटना न्यायिक सुधारों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत को रेखांकित करती है।
Author: Adv. Vijay Mahant, Delhi
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