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धर्म ध्वजा क्या है? और क्या महत्व है?

आपने देखा होगा कि सभी मंदिरो पर विशेष ध्वजा लहराई जाती है। यदि मंदिर के बाहर किसी देवी या देवता का नाम न लिखा हो तब भी आप उस ध्वजा को देखकर उस देवालय के देवता के बारे में जान सकते हैं। What is the Dharma Dhwaja and what is its significance? किस देवता की कौन सी ध्वजा? - जिस प्रकार सभी देवी-देवताओं के अपनी-अपनी एक सवारी और अपने-अपने अस्त्र होते हैं, उसी प्रकार उनसे संबंधित ध्वज भी अलग-अलग होते हैं.

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धर्म ध्वजा क्या है? और क्या महत्व है?

जो धर्म ध्वजा को नहीं मानता, वह दंड का अधिकारी होता है, नकारात्मक ऊर्जाये प्रवेश करने से डरती है। कुल में नीच प्रवृत्ति की आत्माये शरीर प्राप्त करती है, What is the Dharma Dhwaja and what is its significance?

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जो (कब्र) गड्ढे में गाड़ दिए जाते हैं, उन्हें सनातन लोक की प्राप्ति होती है?

रघुकुल के श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को राक्षस लिये जा रहा है- यह देखकर सीता अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगीं। 'हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार विचार वाले दशरथ नन्दन श्रीराम और लक्ष्मण को यह रौद्र रूप धारी राक्षस लिये जा रहा है। 'राक्षसशिरोमणे ! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो,…

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जो (कब्र) गड्ढे में गाड़ दिए जाते हैं, उन्हें सनातन लोक की प्राप्ति होती है?

शरीर को गड्ढे में गाड़कर कुशल पूर्वक चले जाइये। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्पराप्राप्त) धर्म है। जो राक्षस गड्ढे में गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।

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श्री धन्वन्तरि, श्री लक्ष्मी जी और श्री विश्वकर्मा जी के प्रादुर्भाव की कथा

देवाधि देव भगवान‌ श्री विष्णु के कहने पर सम्पूर्ण देवता दैत्यों के साथ सन्धि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गये। देव, दानव और दैत्य सब मिलकर सब प्रकार की ओषधियाँ ले आये और उन्हें क्षीर सागर में डालकर मन्दराचल को मथानी एवं वासुकि नाग को नेती बनाकर बड़े वेग से मन्थन करने लगे। भगवान् विष्णु की प्रेरणा से सब देवता एक साथ रहकर वासुकि की पूँछ की ओर हो गये और दैत्यों को उन्होंने वासुकि के सिर की ओर…

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श्री धन्वन्तरि, श्री लक्ष्मी जी और श्री विश्वकर्मा जी के प्रादुर्भाव की कथा

Dipawali का धार्मिक महत्त्व - धन्वन्तरि जयंती - धनतेरस के दिन मनाई जाती है। लक्ष्मी पूजन - दीपावली की अमावस्या को। विश्वकर्मा पूजन - भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को।

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दीपमालिकोत्सव – कौमुदी तिथि की विधि, सूप बजाकर अलक्ष्मी को विदा करना

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा - महाराज ! पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने वामन रूप धारण कर दानव राज बलि को छलकर इन्द्र को राज्य का भार सौंप दिया और राजा बलि को पाताल लोक में स्थापित कर दिया। भगवान ने बलि के यहाँ सदा रहना स्वीकार किया। कार्तिक की अमावस्या को रात्रि में (Dipawali ki Raat) सारी पृथ्वी पर दैत्यों की यथेष्ट चेष्टाएँ होती हैं।

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दीपमालिकोत्सव - कौमुदी तिथि की विधि, सूप बजाकर अलक्ष्मी को विदा करना

आधी रात बीत जाने पर जब सब लोग निद्रा में हों, उस समय घर की स्त्रियों को चाहिये कि वे सूप बजाते हुए घर भर में घूमती हुई आँगन तक आयें और वे दरिद्रता,अलक्ष्मी का अपने घर से निस्सारण करें

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गोवर्धन (अन्नकूट) पर्वत की परिक्रमा का माहात्म्य

स्रोत - संक्षिप्त श्रीवराहपुराण, अध्याय 164 165 पेज 292 - भगवान् वराह कहते हैं - देवि ! मथुरा के पास ही पश्चिम दिशा में दो योजन के विस्तार में गोवर्धन नाम से प्रसिद्ध एक क्षेत्र है, जहाँ वृक्षों और लताओं से मण्डित एक सुन्दर सरोवर भी है। मथुरा के पूर्व भाग में 'इन्द्र' तीर्थ, दक्षिण में 'यम' तीर्थ, पश्चिम में 'वरुण' तीर्थ और उत्तर में 'कुबेर' तीर्थ - ये चार तीर्थ हैं।

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गोवर्धन (अन्नकूट) पर्वत की परिक्रमा का माहात्म्य

स्रोत – संक्षिप्त श्रीवराहपुराण, अध्याय 164 165 पेज 292 – भगवान् वराह कहते हैं – देवि ! मथुरा के पास ही पश्चिम दिशा में दो योजन के विस्तार में गोवर्धन नाम से प्रसिद्ध एक क्षेत्र है, जहाँ वृक्षों और…

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संकल्प, विकल्प और निर्विकल्प किसे कहते है?

विकल्प - कल्पना कीजिए, आप अपने पसंदीदा OTT प्लेटफॉर्म पर एक फिल्म देखने का मन बनाते हैं। आप ऐप खोलते हैं और आपके सामने सैकड़ों, शायद हजारों फिल्मों की एक सूची आ जाती है। क्या देखें? एक्शन, कॉमेडी, या थ्रिलर? आधा घंटा स्क्रॉल करने के बाद, आप थक कर ऐप बंद कर देते हैं और कुछ भी नहीं देखते। यह जानी-पहचानी स्थिति "विकल्प" का सबसे सटीक उदाहरण है। विकल्प, यानी Option या Choice, हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है।

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संकल्प, विकल्प और निर्विकल्प किसे कहते है?

संकल्प से हम अपने निर्णय में स्थिर रहते हैं, विकल्प हमें सोचने के अवसर देते हैं, लेकिन कभी-कभी भ्रम में डालते हैं, और निर्विकल्प हमें पूर्ण शांति और स्थिरता की स्थिति तक ले जाता है।

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तृष्णा किसे कहते है? योगवशिष्ठ

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं - मुनीश्वर ! चेतन जीवरूपी आकाश में हृदय के अज्ञानान्धकार से परिपूर्ण दुस्तर तृष्णारूपिणी रात्रि का सहारा पाकर नाना प्रकार के दोषरूपी उल्लुओं के समूह क्रियाशील हो उठते हैं। जैसे रात में ओस के कणों से अभिषिक्त तथा आस-पास के उपवनों में खिले हुए काञ्चन पुष्प (धतूरे के फूल) की उज्ज्वल शोभा से सुशोभित चने की फलियाँ निश्चय ही अधिक विकास को प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार अनेक तरह के दुःखमय विलापों से प्रकट हुए अश्रुविन्दुओं…

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तृष्णा किसे कहते है? योगवशिष्ठ

मेरुपर्वत के समान परम उन्नत, विद्वान्, शूरवीर, सुस्थिर और श्रेष्ठ मनुष्य को भी यह एकमात्र तृष्णा ही पलभर में याचक बनाकर तिनके के समान हलका कर देती है।

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विनायक पूजा का क्या माहात्म्य है?

शतानीक ने कहा - मुने ! अब आप मुझे भगवान्‌ गणेश की आराधना के विषय में बतलायें । सुमन्तु मुनि बोले - राजन्‌ ! भगवान्‌ गणेश की आराधना में किसी तिथि, नक्षत्र या उपवासादि की अपेक्षा नहीं होती। जिस किसी भी दिन श्रद्धा-भक्ति पूर्वक भगवान्‌ गणेश की पूजा की जाय तो वह अभीष्ट फलों को देनेवाली होती है। कामना-भेद से अलग-अलग वस्तुओं से गणपति की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने से मनोवाज्छित फल की प्राप्ति होती है ।

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विनायक पूजा का क्या माहात्म्य है?

श्रीगणेशजी के अनुकूल होने से सभी जगत्‌ अनुकूल हो जाता है। जिस पर एकदन्त भगवान्‌ गणपति संतुष्ट होते हैं, उसपर देवता, पितर, मनुष्य आदि सभी प्रसन्न रहते हैं

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एकादशी व्रत की विधि और महिमा – भद्रशील की कथा

Method and glory of Ekadashi fast श्रीसनक जी कहते हैं - नारदजी! अब मैं इस अन्य व्रत का, जो तीनों लोकों में विख्यात है, वर्णन करूँगा। यह सब पापों का नाश करने वाला तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलों को देने वाला है। इसका नाम है एकादशी व्रत। यह भगवान् विष्णु को विशेष प्रिय है। ब्रह्मन् ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री, जो भी भक्तिपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, उनको यह मोक्ष देनेवाला है। यह मनुष्यों को उनकी समस्त अभीष्ट…

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एकादशी व्रत की विधि और महिमा - भद्रशील की कथा

पूर्वजन्म की बातों की स्मृति से मैंने एकादशी व्रत को जान लिया है। जो व्रत किया गया था, उसका यह फल मिला है। प्रभो! फिर जो भक्तिपूर्वक एकादशी व्रत करते हैं

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श्रीराम के मंत्रों का पुरश्चरण कैसे करते हैं?

सनकादि ऋषियों ने हनुमान जी से पूछा - आप श्रीराम मन्त्रों के पुरश्चरण का विधान बताइये। हनुमान् जी ने बताया - नित्य त्रिकाल स्नान करे। दूध फल मूल आदि भोजन करो। केवल दूध ही पिये। अथवा यज्ञ के अन्नों का ही भोजन करे। ब्रह्मचर्य आदि जिस आश्रम में ही उस की विधि का निर्वाह करते हुये भोजन के ६ रसों का त्याग कर दे। वाणी कर्म मन से स्त्री संसर्ग से दूर रहकर पवित्र रहे। गुरु में आस्था कर, पृथ्वी पर सोने वाला, कामना रहित, ब्रह्मचारी…

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श्रीराम के मंत्रों का पुरश्चरण कैसे करते हैं?

सनकादि ऋषियों ने हनुमान जी से पूछा - आप श्रीराम मन्त्रों के पुरश्चरण का विधान बताइये। हनुमान् जी ने बताया - नित्य त्रिकाल स्नान करे। दूध फल मूल आदि भोजन करो।

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