दस्तूर

"दीप जिसका महल्लात ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साए में हर हर मसलहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख्त-ए-दार से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़ियार से
क्यूँ डराते हो जिन्दाँ की दीवार से"

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#HabibJalib #Dastoor #Poetry #Urdu #ProtestAgainstCAB

Listen to Habib Sahab reciting 'Dastoor' himself.

https://youtu.be/_dUoTeqH3JY

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Main Nahi Manta- Habib Jalib

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