उलझ कर तेरी जुल्फों में यूं आबाद हो जाऊं कि जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊं,
मैं जमुना की तरह तन्हा निहारूं ताज को कब तक
कोई गंगा मिले तो मैं इलाहाबाद हो जाऊं,
ग़ज़ल कहने लगा हूँ मैं ज़रा मुस्कुरा तो दो
यहीं तो चाहती थी तुम के मैं बर्बाद हो जाऊं...🖤