छह दिसंबर की दोपहर बाबरी मस्जिद के गुम्बदों के गिरने का समय दर्ज करते हुए,बड़बड़ाते पागल हो गए लोगों के चेहरे देखते हुए,खबर लिखते हुए,कारसेवकों की पिटाई के दर्द के सुन्न हो जाने तक पीते हुए मैं यही अपने मन में बिठाता रहा कि लोकतंत्र एक नाटक है, आदमी अब भी पत्थर युग जितना ही बर्बर है, देश में कुछ निर्णायक रूप से बदल चुका है.मैं हैरान था क्योंकि एक व्यक्तिगत उपलब्धि जैसा भाव उमड़ रहा था-मैने सभ्यता का दूध नहीं खून पीते लंबे दांतो और टपकते पंजों वाले इतिहास को नंगधड़ंग देख लिया है.
~अनिल यादव
~अनिल यादव
