IPS इल्मा अफरोज की तैनाती पर हाई कोर्ट ने गृह सचिव और डीजीपी को भेजा नोटिस, जानें कब होगी अगली सुनवाई

Himachal News: IPS अधिकारी इल्मा अफ़रोज़ की तैनाती को लेकर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट सख्त नजर आ रहा है। हाई कोर्ट ने सुच्चा सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए गृह सचिव और डीजीपी को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 4 जनवरी को तय की है।

लंबी छूटी पर जाने के बाद इल्मा अफ़रोज़ की 16 दिसंबर से पुलिस मुख्यालय में तैनाती दी गई है जबकि BBN के लोगों ने बद्दी में उनकी तैनाती की मांग की है।न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश राकेश कैंथला की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता सूचा सिंह द्वारा दायर याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के पश्चात यह आदेश जारी किए। प्रार्थी ने इस मामले में हाईकोर्ट से उपयुक्त आदेश जारी करने की मांग करते हुए कहा कि इल्मा अफरोज की बद्दी, बरोटीवाला और नालागढ़, जिला सोलन में तैनाती से वहां की आम जनता कानून के हाथों सुरक्षित महसूस करेगी।

साथ ही क्षेत्र में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी ड्रग माफियाओं और खनन माफियाओं के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित हो पाएगी।प्रार्थी के एडवोकेट का कहना है कि जब से इल्मा अफरोज को साल 2024 में पुलिस अधीक्षक, बद्दी, बरोटीवाला और नालागढ़ के रूप में तैनात किया गया था तब से क्षेत्र में कानून के राज को लागू किया था। एनजीटी द्वारा जारी सभी निर्देशों के साथ-साथ हिमाचल हाईकोर्ट द्वारा पारित सभी आदेशों को लागू किया।

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मंडी के धर्मपुर में बालन के कटान पर हाई कोर्ट ने जारी किए सख्त आदेश, कहा, प्रतिबंधित पेड़ों का न हो कटान

Shimla News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने मंडी के धर्मपुर में बालन की लकड़ी के कटान सहित अंधाधुंध पेड़ काटने के मामले में सरकार को कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश राकेश कैंथला की खंडपीठ ने सरकार को यह सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं कि वहां पर कोई अवैध तरीके से प्रतिबंधित प्रजातियों के पेड़ों का कटान न हो। अगर कोई नियमों का उल्लंघन करते हुए और बिना परमिट के पेड़ काटते हुए पाया जाए तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। इस मामले में रिन्यूवल ऊर्जा कंपनी को दस्ती नोटिस जारी किया गया है। इस कंपनी की निदेशक एक नेता की पत्नी हैं। मामले की अगली सुनवाई एक जनवरी को होगी।

याचिकाकर्ता ने याचिका में सात लोगों को प्रतिवादी बनाया है, जिनमें से अदालत ने एक से चार क्रम तक रखे गए प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर दिए हैं। इनमें सचिव वन, डीएफओ जोगिंद्रनगर, रेंज वन अधिकारी धर्मपुर और रेंज अधिकारी कमलाह शामिल हैं। पांचवां प्रतिवादी एक रिन्यूवल ऊर्जा कंपनी की निदेशक को बनाया गया है, जो एक नेता की पत्नी हैं। इस कंपनी निदेशक को दस्ती नोटिस जारी किया गया है। कंपनी पर आरोप लगाया गया है कि पेड़ों का अंधाधुंध कटान किया जा रहा है और इन्हें बेचा जा रहा है। एसपी मंडी के अलावा एक अन्य महिला को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि इस क्षेत्र में घरेलू इस्तेमाल के लिए काटे जा रहे पेड़ों के साथ और पेड़ भी काटे जा रहे हैं, जिन्हें बाद में बेचा जा रहा है। उधर, धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में हुए इस पेड़ कटान की जांच के लिए भाजपा ने विधायकों की एक कमेटी भी बनाई है। यह कमेटी अपने स्तर पर मामले की जांच कर रही है।

41 लोगों को करुणामूलक नौकरियां देने का क्या था आधार, हलफनामा दें सीएस : कोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नियमों को ताक पर रखकर करुणामूलक आधार पर नौकरियां देने के मामले में सरकार और स्वास्थ्य विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। उच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य विभाग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि करुणामूलक नौकरियां देते समय कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई। जिसकी राजनीति में पैठ है, उसे ही फायदा दिया जा रहा है। आम लोगों की सुनवाई कहीं भी नहीं हो रही है। उनके पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत तौर पर इस पर हलफनामा दायर करने के निर्देश दिए हैं कि 5 फीसदी करुणामूलक कोटे के तहत 41 लोगों को किस आधार पर नौकरी दी गई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि जिसकी व्यवस्था में पहुंच है, उसी की चल रही है। अदालत ने सरकार को याचिकाकर्ता को तत्काल नियुक्ति प्रदान करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि आवेदक का नाम करुणामूलक सूची में 5वें नंबर पर है। इसके बाद भी विभाग ने उसके नीचे वाले 41 लोगों को क्लर्क की नौकरियां दे दीं। अगली सुनवाई 8 जनवरी को होगी। न्यायाधीश गोयल की अदालत ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग ने क्लर्क के पद पर अनुकंपा के आधार पर उन लोगों को नियुक्तियां दे दीं, जिनके माता-पिता व पति-पत्नी की मौत वर्ष 2013 में याचिकाकर्ता के बाद हुई है।

क्या है मामला

आवेदक की मां स्वास्थ्य विभाग में वार्ड सिस्टर के पद पर तैनात थीं। वर्ष 2013 में उनकी मौत हो गई। आवेदक ने 2014 में स्वास्थ्य विभाग में अनुकंपा आधार पर करुणामूलक नौकरी के लिए 5 फीसदी कोटे के तहत आवेदन किया। इस सूची में उसका नाम पांचवें नंबर पर था। विभाग ने साल 2022 में इसके आवेदन को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने इसके खिलाफ वर्ष 2022 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत ने वर्ष 2023 में इस मामले का निपटारा करते हुए विभाग को 5 फीसदी कोटे के तहत इस पर ताजा निर्णय लेने के आदेश दिए। विभाग ने इसके बाद इस पर कोई निर्णय नहीं लिया। याचिकाकर्ता ने उसके बाद अदालत के आदेशों को लागू करने के लिए निष्पादन याचिका दायर की। अदालत ने अपने पिछले आदेश में विभाग को आदेश दिए थे कि 18 मई 2013 के बाद 5 फीसदी कोटे में क्लर्क पद पर कितनी नियुक्तियां की गई हैं। इस पर स्वास्थ्य विभाग के निदेशक की ओर से अदालत में पेश हलफनामे में बताया गया कि 41 लोगों को 5 फीसदी कोटे के तहत नियुक्तियां दी गई हैं।

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हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रतिबंधित प्रजातियों के पेड़ों की लड़की की बिक्री पर लगाई रोक

Shimla News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य में प्रतिबंधित प्रजातियों के पेड़ों की लकड़ी की बिक्री पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिए हैं कि वह संबंधित कानून, नियमों और अधिसूचना के मद्देनजर यह सुनिश्चित करे कि पेड़ों का परिवहन बिना परमिट के न किया जाए।

इसके साथ ही निजी तौर पर गठित प्रतिवादी बाहरी रिन्यूएबल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक धर्मपुर निवासी कविता और अमृतलाल को भी बिना किसी वैध परमिट के प्रतिबंधित प्रजातियों के पेड़ों को काटने के बाद परिवहन करने पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की खंडपीठ ने सुरेंद्र पाल सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान उक्त आदेश पारित किए।

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लूहरी परियोजना के प्रभावितों को जारी 76 लाख रुपए कहां गए, हाई कोर्ट ने सरकार के हलफनामे पर जताया असंतोष

Himachal News: सतलुज जल विद्युत निगम प्रबंधन द्वारा लूहरी परियोजना प्रभावितों को जारी की गई 76 लाख रुपये की मुआवजा राशि के आवंटन पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि राहत राशि कहां गई। कोर्ट ने मामले में सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे पर असंतोष जताया है और न्यायमित्र को इस पर अपनी रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

लूहरी परियोजना में अंधाधुंध ब्लास्टिंग के कारण नरोला गांव के लोगों को जान-माल का खतरा बना हुआ है। अवैज्ञानिक ब्लास्टिंग के कारण घरों में दरारें आ गई हैं। लगातार बढ़ रहे प्रदूषण का लोगों के स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ रहा है। बादाम और सेब के बाग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। गांव के ऊपर पहाड़ियां और बड़ी चट्टानें हैं, जिनसे पत्थर गिर रहे हैं और उनमें दरारें आ गई हैं। नरोला के लोगों ने 16 नवंबर 2021 को हाईकोर्ट को पत्र लिखकर परियोजना से हुए नुकसान और यथास्थिति से अवगत कराया था।

पत्र का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने एसजेवीएन के साथ राज्य सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और ग्राम पंचायत को पक्षकार बनाकर स्थिति स्पष्ट करने के आदेश दिए थे। आईआईटी रुड़की ने जांच कर रिपोर्ट में बताया कि मकानों में दरारें ब्लास्टिंग के कारण आई हैं। इस पर कोर्ट ने सरकार और कंपनी को दरारें भरने के निर्देश दिए थे।

एसजेवीएन ने हाईकोर्ट को बताया कि प्रभावित लोगों की दरारें भरने के लिए 76 लाख रुपये जमा करवा दिए गए हैं। 13 नवंबर को कोर्ट ने एसडीएम रामपुर से जवाब मांगा था कि यह पैसा कहां खर्च हुआ है और किसे दिया गया है। हाईकोर्ट ने सरकार के अस्पष्ट हलफनामे पर असंतोष जताया है और कोर्ट की ओर से एमिकस क्यूरी को इस मामले में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च 2025 को होगी।

प्रदूषण के कारण लोग फेफड़े और लीवर की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं

नरोला गांव के हरीश ने बताया कि परियोजना और प्रदूषण के कारण लोगों को बीपी, फेफड़े, लीवर और शुगर की बीमारियां हो रही हैं। साथ ही फसलें भी नष्ट हो गई हैं। नीरथ पंचायत के लोगों ने सरकार, कंपनी और ठेकेदारों पर आरोप लगाया है कि रात के अंधेरे में जब सब सो रहे होते हैं, तब ब्लास्टिंग की जाती है। सुबह होते ही सब कुछ सतलुज में बह जाता है। मकानों में आई दरारों को ठीक करने के लिए किसी को 15 हजार तो किसी को 20 हजार रुपए दिए गए। परियोजना के कारण ग्राम पंचायत नीरथ, दत्तनगर, थेली चकती, देल्थ, थानाधार, किंगल को नुकसान हुआ है।

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आउटसोर्स भर्ती में नियमों का हो रहा उल्लंघन, हाई कोर्ट ने पूछा, क्या फिनाइल बेचने वाली कंपनी कर सकती है नर्सों की भर्ती

Himachal News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आउटसोर्स भर्ती को लेकर नियमों के उल्लंघन पर सरकार की अस्थायी व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने सरकार से पूछा है कि क्या फिनाइल बेचने वाली कंपनी नर्सों की भर्ती कर सकती है। सरकार ने इसके लिए कोई मापदंड और नियम नहीं बनाए हैं।

जेके इंटरप्राइजेज की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है कि किन मापदंड के तहत कंपनी को काम दिया जाता है और क्या इसमें पारदर्शिता है। इस पर सरकार ने अपना जवाब दाखिल किया है, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई है। इस मामले की सुनवाई 31 दिसंबर को होगी। कंपनी ने आरोप लगाया है कि निगम ने 5 प्रतिशत कमीशन तय किया है, जिसमें से 2.5-2.5 प्रतिशत निगम और कंपनियों को जाता है। इससे कंपनियों ने वित्तीय नीलामी का अधिकार खो दिया है। निगम कंपनियों को सूचीबद्ध करता है, जिसके बाद विभाग निगम को संस्तुति भेजता है। अगर काम के लिए 10 से कम लोगों की जरूरत होती है, तो कंपनियों को रोटेशन के तहत काम दिया जाता है।

अगर इससे ज्यादा है, तो कोई नियम नहीं है। उसके लिए तकनीकी नीलामी की जाती है। अगर विभाग की ओर से किसी कंपनी के नाम की संस्तुति की जाती है, तो उस कंपनी को काम दे दिया जाता है। निगम ने 36 कंपनियों का चयन किया है, जिनके जरिए विभागों का काम आउटसोर्स किया जाता है। निगम इनसे 50-50 हजार रुपये लेता है।

हिमाचल प्रदेश में आउटसोर्सिंग प्रक्रिया वित्तीय नियम 2009 के तहत शुरू की गई है, जिसके तहत सलाहकार बोर्ड, पंजीकरण, लाइसेंस और अधिसूचना होनी चाहिए, जबकि हिमाचल प्रदेश निगम इन सभी नियमों को दरकिनार कर आउटसोर्सिंग भर्तियां कर रहा है।

आउटसोर्सिंग भर्तियों पर लगी रोक हटाने के लिए सरकार ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की

आउटसोर्सिंग भर्तियों पर लगी रोक हटाने के लिए सरकार की ओर से हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि आउटसोर्सिंग भर्तियों की प्रक्रिया के लिए सरकार कमेटी बनाने पर विचार कर रही है। इस कमेटी की निगरानी राज्य सरकार करेगी, जिससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी।

सरकार की ओर से दाखिल अर्जी पर अब 31 दिसंबर को सुनवाई होगी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सत्येन वैद्य की खंडपीठ मामले की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने 7 नवंबर को इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की ओर से विभागों में की जा रही सभी भर्तियों पर रोक लगा दी थी।

खंडपीठ ने कंपनियों और अभ्यर्थियों का सारा डाटा वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि राज्य में करीब 110 कंपनियां फर्जी पाई गई हैं। भर्ती प्रक्रिया के लिए कोई नियम नहीं बनाए गए हैं। केंद्र की नीति के तहत केवल चतुर्थ श्रेणी के पदों को ही आउटसोर्स किया जाता है, जबकि हिमाचल प्रदेश में तृतीय श्रेणी के पदों को भी आउटसोर्स किया जा रहा है।

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आउटसोर्स भर्तियों से हटाई जाए रोक, हाई कोर्ट पहुंची प्रदेश सरकार; जानें कब होगी सुनवाई

Himachal News: आउटसोर्स भर्तियों पर लगाई गई रोक को हटाने के लिए सरकार की ओर से हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। एडवोकेट जनरल ने कोर्ट को बताया कि आउटसोर्स भर्तियों की प्रक्रिया के लिए सरकार कमेटी बनाने पर विचार कर रही है। इस कमेटी की निगरानी राज्य सरकार करेगी, जिससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। सरकार की ओर से दाखिल अर्जी पर अब 31 दिसंबर को सुनवाई होगी।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सत्येन वैद्य की खंडपीठ मामले की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने 7 नवंबर को इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन की ओर से विभागों में की जा रही सभी भर्तियों पर रोक लगा दी थी। खंडपीठ ने कंपनियों और अभ्यर्थियों का सारा डाटा वेबसाइट पर अपलोड करने के निर्देश दिए हैं।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में करीब 110 कंपनियां फर्जी पाई गई हैं। भर्ती की प्रक्रिया के लिए कोई नियम नहीं बनाए गए हैं। केंद्र की नीति के तहत केवल चतुर्थ श्रेणी के पदों को ही आउटसोर्स किया जाता है, जबकि हिमाचल प्रदेश में तृतीय श्रेणी के पदों को भी आउटसोर्स किया जा रहा है।

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राम देव की पतंजलि के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचा डाबर, बताया आदतन अपराधी; जानें क्या है विज्ञापन से जुड़ा मामला

Dabur vs Patanjali Ayurveda: अपने कई उत्पादों के लिए मशहूर कंपनी डाबर ने बाबा रामदेव की पतंजलि के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और उसके विज्ञापन पर रोक लगाने की मांग की है, जिसमें पतंजलि आयुर्वेद कथित तौर पर उसके च्यवनप्राश उत्पादों के खिलाफ अपमानजनक विज्ञापन चला रहा है। मंगलवार को दायर अपनी याचिका में डाबर ने आरोप लगाया है कि पतंजलि आयुर्वेद उसके च्यवनप्राश उत्पादों के खिलाफ अपमानजनक विज्ञापन चला रहा है। याचिका में डाबर ने पतंजलि को अपमानजनक विज्ञापन चलाने से तुरंत रोकने का आदेश मांगा है।

डाबर की अर्जी पर जस्टिस मिनी पुष्करणा ने संबंधित पक्ष को नोटिस जारी कर अंतरिम आदेशों पर विचार करने के लिए मामले को जनवरी के आखिरी हफ्ते में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जब डाबर ने सुनवाई की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, तो जस्टिस पुष्करणा ने शुरू में इसे मध्यस्थता के लिए भेजने की इच्छा जताई थी, लेकिन जब डाबर ने मामले में तुरंत राहत देने की बार-बार गुहार लगाई, तो उन्होंने आखिरकार मामले की सुनवाई करने का फैसला किया।

डाबर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने दलील दी कि पतंजलि आयुर्वेद आदतन अपराधी है। उन्होंने इस साल की शुरुआत में पतंजलि के खिलाफ दायर अवमानना याचिका में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी हवाला दिया, जिसमें पतंजलि, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने अखबारों में लिखित माफीनामा प्रकाशित किया था।

डाबर ने अपनी दलील में कहा कि वह पतंजलि आयुर्वेद के संस्थापक स्वामी रामदेव के एक विज्ञापन से व्यथित है, जिसमें उन्होंने कहा है, “जिन लोगों को आयुर्वेद और वेदों का ज्ञान नहीं है, वे चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि और च्यवनऋषि की परंपरा में ‘असली’ च्यवनप्राश कैसे बना सकते हैं?” (उन्होंने कहा कि केवल पतंजलि स्पेशल च्यवनप्राश ही ‘असली’/प्रामाणिक है; और बाजार में अन्य च्यवनप्राश के निर्माताओं को इस परंपरा का कोई ज्ञान नहीं है, और परिणामस्वरूप, वे सभी नकली/’साधारण’ हैं)।

सिब्बल के अनुसार, अन्य च्यवनप्राश को ‘साधारण’ कहना यह दर्शाता है कि वे घटिया हैं। उन्होंने कहा कि बाबा रामदेव की पतंजलि का विज्ञापन च्यवनप्राश की पूरी श्रेणी को नीचा दिखाता है, जो एक सदियों पुरानी आयुर्वेदिक दवा है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि सभी च्यवनप्राश को प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित विशिष्ट फॉर्मूलेशन और सामग्री का पालन करना चाहिए, जिससे “साधारण” च्यवनप्राश की धारणा भ्रामक और डाबर जैसे प्रतिस्पर्धियों के लिए हानिकारक हो जाती है क्योंकि डाबर का इस सेगमेंट में 61.6% बाजार हिस्सा है।

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि पतंजलि का विज्ञापन न केवल उपभोक्ताओं को गुमराह कर रहा है बल्कि अन्य ब्रांडों को भी बदनाम कर रहा है क्योंकि उनका विज्ञापन यह संदेश दे रहा था कि केवल उनके पास ही च्यवनप्राश तैयार करने का सही ज्ञान और तरीका है और बाकी सभी अनुभवहीन और दूसरे दर्जे के उत्पादक हैं।

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न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया होंगे हिमाचल के नए मुख्य न्यायधीश, पिता रह चुके है चीफ जस्टिस

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को नए मुख्य न्यायाधीश मिल गए हैं. न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया हिमाचल के नए मुख्य न्यायाधीश होंगे. मौजूदा वक्त में वे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज हैं.

इसी हफ्ते संधावालिया पदभार ग्रहण कर सकते हैं. इस संबंध में भारत सरकार के सह सचिव जगन्नाथ श्रीनिवासन की ओर से अधिसूचना जारी कर दी गई है. इसी हफ्ते में शिमला से राजभवन में शपथ ग्रहण कर सकते हैं.

दरअसल, 11 जुलाई, 2024 न्यायमूर्ति गुरमीत सिंह संधावालिया को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश पद के लिए अनुशंसित किया गया था. अब जस्टिस संधावालिया को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया है. इससे पहले 19 अक्टूबर को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहे राजीव शकधर रिटायर हो चुके हैं. उनकी रिटायरमेंट के बाद से न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान हिमाचल उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

पिता भी रह चुके हैं चीफ जस्टिस

59 साल के जस्टिस गुरमीत सिंह ने साल 1986 में चंडीगढ़ के डीएवी कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास की थी. साल 1989 में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी की. इसी साल वह पंजाब एवं हरियाणा के बार काउंसिल में बतौर एडवोकेट जुड़ गए. जस्टिस गुरमीत लीगल पृष्ठभूमि वाले परिवार से आते हैं. उनके पिता साल 1978 और साल 1983 के बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और साल 1983 से साल 1987 के बीच पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं.

हिमाचल में यह जज दे रहे सेवाएं

मौजूदा वक्त में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान समेत कुल 11 जज हैं. जस्टिस चौहान के साथ यहां जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर, जस्टिस अजय मोहन गोयल, जस्टिस संदीप शर्मा, जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ, जस्टिस सत्येन वैद्य, जस्टिस सुशील कुकरेजा, जस्टिस वीरेंद्र सिंह, जस्टिस रंजन शर्मा, जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी और जस्टिस राकेश कैंथला सेवाएं दे रहे हैं. अब जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया के हिमाचल हाइकोर्ट आने से यहां उनके साथ जजों की कुल संख्या 12 हो जाएगी.

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हिमाचल हाई कोर्ट ने रिजेक्ट की नकली दवा बनाने वाली कंपनी के मालिक की जमानत याचिका, जानें पूरा मामला

Bail Plea Of Owner Of Fake Drug Manufacturing Company In Baddi Rejected: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (Himachal Pradesh High Court) ने औद्योगिक क्षेत्र (Fake Drug Manufacturing Company In Baddi) बद्दी में नकली दवा बनाने वाली कंपनी के मालिक की (Bail Plea Rejected) जमानत याचिका रद्द कर दी।

न्यायाधीश विरेंदर सिंह ने जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि भारी मात्रा में घटिया-नकली दवाओं की बरामदगी अपराध की गंभीरता को बयां करती है और अगर प्रार्थी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया जाता है, तो इससे समाज में गलत संदेश जाएगा कि ऐसा अपराध करने के बाद भी आवेदक समाज में खुलेआम घूम रहा है। कोर्ट ने जमानत याचिका रद्द करने का एक और कारण स्पष्ट करते हुए कहा कि नकली दवाओं का उन लोगों पर प्रभाव, जो आशा और विश्वास में उनका सेवन करते थे, को अभी की परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

6 अक्टूबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था

कोर्ट ने कहा कि सरकारी विश्लेषक, क्षेत्रीय औषधि परीक्षण प्रयोगशाला चंडीगढ़ की रिपोर्ट भी अपराध की गंभीरता के बारे में बहुत कुछ कहती है। कोर्ट ने कहा कि आवेदक को जमानत पर रिहा करने से अन्य दवा निर्माताओं को भी आसान पैसा कमाने के लिए घटिया/नकली दवाएं बनाने/विपणन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। मामले के अनुसार प्रार्थी अवेंद्र शुक्ला ने उसे ड्रग्स इंस्पेक्टर बद्दी द्वारा ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट, 1940 की विभिन्न धाराओं के तहत पंजीकृत मामले में जमानत पर रिहा करने के लिए जमानत याचिका दायर की थी। उसे 6 अक्टूबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था।

प्रार्थी फर्जी फर्म के नाम से नकली और घटिया दवाओं के निर्माण में लिप्त

जांच एजेंसी के अनुसार 27 जनवरी 2023 को लाइसेंस की समाप्ति के बावजूद बद्दी स्थित मेसर्स ग्लेनमार्क हेल्थकेयर (M/s Glenmars Healthcare, Baddi) एलोपैथिक दवाओं का कारोबार कर रही थी और प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार, बरामद दवाएं घटिया/नकली गुणवत्ता की पाई गईं। शिकायतकर्ता के अनुसार उक्त परिसर से भारी मात्रा में दवाइयां, यानी एमोक्सस-500 कैप्सूल (69 बक्से), डॉक्सटिल-200 टैबलेट (79 बक्से), एमईएफ 200 टैबलेट (100 बक्से), जैथ्रॉन-500 टैबलेट (26 बक्से), रॉक्सिम-500 कैप्सूल (66 बक्से) और एम्पीसिलीन-500 कैप्सूल (19 बक्से) बरामद किए गए थे। इसके इन दवाओं को जांच के लिए प्रयोगशाला में भेजा गया और विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार उपरोक्त पांच दवाओं में वास्तविक सामग्री का प्रतिशत 00.00% था, जबकि एक उल्लिखित दवा में यह 83.71% पाया गया। जांच एजेंसी ने कथित तौर पर पाया कि मेसर्स ग्लेनमार्क हेल्थकेयर से बरामद दवाएं नकली प्रकृति की हैं और प्रार्थी फर्जी फर्म के नाम से नकली और घटिया दवाओं के निर्माण में लिप्त हैं।

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जम्मू कश्मीर में चेहरे से नकाब हटाने से मुकरी महिला वकील, जमकर हुई बहस; हाईकोर्ट सुनवाई से मुकरा

Jammu Kashmir News: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने पिछले दिनों एक ऐसी मुस्लिम महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया, जिसने सुनवाई के दौरान अपना चेहरा ढका हुआ था। जब जज ने महिला से नकाब हटाकर चेहरा दिखाने को कहा था, कथित वकील ने चेहरा दिखाने से इनकार कर दिया। इसके बाद जज ने उस मामले की सुनवाई करने से इनकार कर दिया और हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से रिपोर्ट मांगी कि क्या किसी महिला वकील को चेहरा ढककर किसी मामले की पैरवी करने की अनुमति है। कोर्ट ने उस महिला वकील की बात सुनने से इनकार कर दिया और आगे की तारीख दे दी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट की जांच करने के बाद हाई कोर्ट की जस्टिस मोक्ष खजूरिया काज़मी ने 13 दिसंबर को अपने आदेश में कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा निर्धारित नियमों में से किसी में भी ऐसे अधिकार का उल्लेख नहीं है, जिसके तहत कोई भी महिला चेहरे पर नकाब लगाकर या बुर्का पहनकर अदालत में मामले की पैरवी कर सकें। कोर्ट ने कहा कि BCI की नियमावली के अध्याय IV (भाग VI) की धारा 49(1) (जीजी) में महिला अधिवक्ताओं के लिए अनुमत ड्रेस कोड का विवरण दिया गया है। कोर्ट ने कहा, “इन नियमों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए इस तरह की कोई पोशाक स्वीकार्य है।”

दरअसल, 27 नवंबर को हाई कोर्ट में कथित तौर पर एक महिला वकील पेश हुई थीं, जिन्होंने अपना नाम सैयद एनैन कादरी बताया था और घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से पेश होते हुए इस मामले को रद्द करने की मांग की। इस दौरान वह कोर्ट रूम में वकील की ड्रेस में थीं लेकिन अपने चेहरे को ढक रखा था। उस समय जस्टिस राहुल भारती मामले की सुनवाई कर रहे थे। जस्टिस भारती ने तब उस महिला वकील से चेहरे पर से नकाब हटाने को कहा लेकिन कादरी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। महिला वकील ने जोर देकर कहा कि चेहरा ढकना उसका मौलिक अधिकार है और कोर्ट उससे जबरन ऐसा करने को नहीं कह सकता।

इसके बाद जस्टिस भारती ने उस अर्जी पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि मामले में पैरवी के लिए पेश हुई महिला को वकील के तौर पर ना तो विचार कर सकते हैं और न ही नियमों के मुताबिक स्वीकार्य कर सकते हैं क्योंकि चेहरा ढके होने की स्थिति में यह तय नहीं हो सका कि वह महिला कौन है या उसकी पहचान क्या है। कोर्ट ने मामले सुनवाई स्थगित करते हुए आगे की तारीख दे दी और रजिस्ट्रार जनरल से BCI के नियमों के तहत यह पुष्टि करने को कहा कि क्या ऐसा कोई नियम है, जिसके तहत महिला वकील चेहरा ढक कर पेश हो सकें और मामले की पैरवी कर सकें।

अब रजिस्ट्रार जनरल ने बीसीआई के नियमों का हवाले देते हुए कहा है कि ऐसा प्रावधान नहीं है और सभी वकीलों को एक खास पोशाक में कोर्ट रूम में पेश होने का नियम है। हालांकि, बाद में एक और वकील कादरी की जगह याचिकाकर्ता की पैरवी करने पेश हुआ लेकिन कोर्ट ने आगे की तारीख दे दी। अब नई जज जस्टिस मोक्ष खजूरिया काज़मी ने अपने आदेश में बीसीआई के नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी महिला वकील चेहरा ढक कर या नकाब पहनकर या बुर्के में कोर्ट रूम में पेश नहीं हो सकती।

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